UK Home Office के नए कड़े नियमों के कारण ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज को मजबूरन अंतरराष्ट्रीय छात्रों के एडमिशन ऑफर वापस लेने पड़ रहे हैं। अब वीजा रिजेक्शन रेट को **5%** से नीचे रखना अनिवार्य हो गया है, जिसका सीधा असर भारतीय छात्रों पर भी पड़ रहा है।
ब्रिटिश एजुकेशन सेक्टर फिलहाल एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। UK Home Office ने 1 जून, 2026 से वीजा नियमों को बेहद सख्त कर दिया है। अब किसी भी यूनिवर्सिटी के लिए वीजा रिजेक्शन रेट को 5% से कम रखना अनिवार्य है, जबकि पहले यह छूट 10% तक थी। इस छोटे मार्जिन के कारण यूनिवर्सिटीज अपने स्पोंसरशिप लाइसेंस को बचाने के लिए एहतियाती कदम उठा रही हैं।
रिजेक्शन कम करने की रणनीति
यूनिवर्सिटीज अब उन आवेदनों को पहले ही खारिज कर रही हैं, जिन्हें 'हाई-रिस्क' माना जा रहा है। इसका मुख्य कारण वीजा रिजेक्शन रेट में आई अचानक बढ़ोतरी है, जो 2026 की पहली छमाही में 10.5% पर पहुंच गया था, जबकि 2025 में यह आंकड़ा सिर्फ 2.3% था। लाइसेंस छिनने का डर यूनिवर्सिटीज के लिए एक बड़ा स्ट्रक्चरल रिस्क बन गया है।
किन देशों पर सबसे ज्यादा मार?
यह सख्ती सभी देशों पर समान नहीं है। पाकिस्तान, नाइजीरिया और बांग्लादेश जैसे देशों में ऑफर वापस लेने की दर बहुत ज्यादा बढ़ गई है। भारत में भी इसका असर दिख रहा है, जहां ऑफर कैंसिलेशन रेट 1.2% से बढ़कर 5.2% हो गया है। कई संस्थानों ने रिस्क कम करने के लिए कुछ देशों में भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह रोक दिया है।
फाइनेंशियल और ऑपरेशनल रिस्क
इंटरनेशनल छात्रों की फीस ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज के लिए रेवेन्यू का सबसे बड़ा जरिया है। इससे मिलने वाली रकम का इस्तेमाल रिसर्च और डोमेस्टिक ऑपरेशंस के लिए होता है। अगर अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या घटती है, तो बजट में कटौती, स्टाफ की छंटनी और कोर्स बंद होने का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, इस अनिश्चितता के कारण ग्लोबल लेवल पर यूके की साख को भी नुकसान पहुंचने की आशंका है, जिससे छात्र भविष्य में दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं।
