अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) ने सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन डील (Civil Nuclear Cooperation Deal) को लेकर एक बड़ी शर्त रख दी है। उन्होंने साफ कर दिया है कि यह डील तभी आगे बढ़ेगी जब सऊदी अरब, अब्राहम एकॉर्ड्स (Abraham Accords) में शामिल होगा। इस शर्त से मल्टी-बिलियन डॉलर की इस डील पर बड़ा ग्रहण लगता दिख रहा है, जो फिलहाल अमेरिकी कांग्रेस (US Congress) में 90 दिनों की समीक्षा (Review) के दौर से गुजर रही है।
Detailed Coverage
न्यूक्लियर डील और अब्राहम एकॉर्ड्स का कनेक्शन
ट्रम्प ने एक बयान में कहा है कि अमेरिका और सऊदी अरब के बीच सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन डील को मंजूरी तभी मिलेगी जब सऊदी अरब, इजरायल और कई अरब देशों के बीच हुए सामान्यीकरण समझौतों यानी अब्राहम एकॉर्ड्स का हिस्सा बनेगा। यह बड़ी शर्त ऐसे समय में आई है जब अमेरिका के एनर्जी सेक्रेटरी क्रिस राइट (Chris Wright) और सऊदी एनर्जी मिनिस्टर प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान (Prince Abdulaziz bin Salman) ने हाल ही में इस डील पर हस्ताक्षर किए थे।
न्यूक्लियर एनर्जी प्रोजेक्ट्स पर असर
यह सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट, जिसे 123 एग्रीमेंट (123 Agreement) भी कहा जाता है, सऊदी अरब में अमेरिकी टेक्नोलॉजी, खासकर AP1000 रिएक्टर डिजाइन का उपयोग करके एडवांस्ड न्यूक्लियर रिएक्टर (Advanced Nuclear Reactors) के निर्माण को संभव बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। यह अगले तीन दशकों के लिए एक महत्वपूर्ण मल्टी-बिलियन डॉलर का अवसर माना जा रहा है। इसका मकसद सऊदी अरब को तेल पर अपनी निर्भरता कम करके ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने में मदद करना है। फिलहाल इस डील में यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) पर रोक है और इसका उद्देश्य नागरिक ऊर्जा जरूरतों (Civilian Energy Needs) को पूरा करना है।
कूटनीतिक और रेगुलेटरी अड़चनें
अब यह समझौता अमेरिकी कांग्रेस में 90 सेशन-डे की अनिवार्य समीक्षा अवधि (Mandatory Review Period) में प्रवेश कर चुका है। हालांकि, अगर सांसद इसे ब्लॉक करने के लिए वोट नहीं करते हैं तो समझौता आगे बढ़ सकता है, लेकिन ट्रम्प की इस नई शर्त ने राजनीतिक अनिश्चितता (Political Uncertainty) को काफी बढ़ा दिया है। सऊदी अरब का रुख हमेशा से यह रहा है कि इजरायल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध (Formal Diplomatic Relations) एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य (Independent Palestinian State) की ओर एक विश्वसनीय मार्ग पर निर्भर करते हैं। न्यूक्लियर डील को अब्राहम एकॉर्ड्स से जोड़ने से रियाद के लिए राजनीतिक दांव ऊंचे हो गए हैं, क्योंकि अब किंगडम को अपनी ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर की महत्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय कूटनीति नीति के बीच संतुलन बनाना होगा।
अप्रसार और सुरक्षा चिंताएं (Non-Proliferation and Security Concerns)
कूटनीतिक चुनौतियों के अलावा, यह समझौता परमाणु अप्रसार (Nuclear Non-Proliferation) को लेकर हथियारों के नियंत्रण विशेषज्ञों (Arms Control Experts) और कुछ सांसदों के बीच जांच के दायरे में है। आलोचकों ने चिंता जताई है कि मौजूदा शर्तों में सऊदी अरब को इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के एडिशनल प्रोटोकॉल (Additional Protocol) का पालन करने की आवश्यकता नहीं है, जो परमाणु स्थलों के अनियोजित निरीक्षण (Unannounced Inspections) की अनुमति देता है। हालांकि, डील के समर्थकों का तर्क है कि यह यूएस एटॉमिक एनर्जी एक्ट (US Atomic Energy Act) का अनुपालन करता है और इसमें आवश्यक सुरक्षा उपाय (Safeguards) शामिल हैं। निवेशकों और ऊर्जा क्षेत्र के पर्यवेक्षकों के लिए, मुख्य निगरानी बिंदु कांग्रेस की समीक्षा का परिणाम, नई शर्त पर सऊदी सरकार की कोई भी आधिकारिक प्रतिक्रिया, और यह है कि क्या अप्रसार संबंधी चिंताएं महत्वपूर्ण विधायी विरोध (Legislative Opposition) को जन्म देती हैं जो परियोजना की समय-सीमा में देरी या बदलाव कर सकती हैं।
