गुरुवार को ईरान और अमेरिका के बीच ताजा संघर्ष की खबरों के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें **$78** प्रति बैरल के पार निकल गईं। सप्लाई में रुकावट की आशंकाओं से जहां एशियाई बाजार दबाव में दिखे, वहीं भारतीय Sensex में **0.7%** की बढ़त दर्ज की गई।
मिडिल ईस्ट में तनाव से तेल की कीमतों में आग!
गुरुवार को ग्लोबल ऑयल मार्केट में भारी उछाल देखने को मिला। मिडिल ईस्ट में बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव ने एनर्जी सप्लाई चेन को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसी के चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 1.1% बढ़कर $78.88 प्रति बैरल तक पहुंच गईं। इससे पहले, शांति समझौते की उम्मीदों के चलते तेल की कीमतें $72 के आसपास स्थिर थीं। लेकिन अब, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही में आई कमी की खबरों से कीमतों में यह तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। यह जलडमरूमध्य तेल की ग्लोबल शिपमेंट के लिए एक बेहद अहम रास्ता है।
एशियाई बाजारों पर असर और महंगाई का खतरा
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने कई एशियाई एक्सचेंजों पर चिंता की लहर दौड़ा दी है। चीन का शंघाई कंपोजिट इंडेक्स 0.5% नीचे आ गया। मार्केट एनालिस्ट्स का मानना है कि तेल की कीमतों में यह बढ़ोतरी महंगाई (Inflation) को और बढ़ा सकती है, जिसका असर चीन के हालिया प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) के आंकड़ों में भी दिख रहा है। हांगकांग का हैंग सेंग इंडेक्स भी 0.8% गिर गया, क्योंकि निवेशकों ने कंपनियों के ऑपरेशनल खर्चों पर एनर्जी की बढ़ती लागत के जोखिमों का आकलन किया।
भारतीय बाजार की मजबूती और आगे की राह
इसके विपरीत, भारतीय इक्विटी मार्केट ने उम्मीद से बढ़कर मजबूती दिखाई। Sensex 0.7% की बढ़त के साथ एशिया के बाकी बाजारों के गिरावट के रुझान से अलग खड़ा दिखा। हालांकि, स्थानीय बाजार फिलहाल सकारात्मक दिख रहे हैं, लेकिन बड़े आर्थिक परिदृश्य में इंपोर्ट पर निर्भर सेक्टरों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इंपोर्ट करता है। ऐसे में, लगातार ऊंची कीमतों का सीधा असर करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) पर पड़ सकता है और एविएशन, पेंट्स और कंज्यूमर गुड्स जैसे सेक्टरों की कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
भविष्य के एनर्जी खर्चों पर पैनी नजर
निवेशकों के लिए आने वाले दिनों में सबसे अहम बात इन एनर्जी कीमतों की स्थिरता पर नजर रखना होगा। अगर यह संघर्ष होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक रुकावट पैदा करता है या जहाजों की आवाजाही को बाधित करता है, तो तेल पर सप्लाई रिस्क प्रीमियम (Supply Risk Premium) ऊंचा बना रह सकता है। इससे बाजारों को ब्याज दरों और महंगाई नियंत्रण उपायों के बारे में अपनी उम्मीदों को फिर से आंकना पड़ेगा। निवेशक यह भी देख सकते हैं कि भारत की डोमेस्टिक कंपनियां लागत की भरपाई कैसे करती हैं, क्योंकि प्रॉफिट मार्जिन बनाए रखने की उनकी क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या वे बाजार की मांग को खोए बिना अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा पाती हैं। आने वाले दिनों में बाजार की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि एनर्जी की कीमतें $78 के स्तर से ऊपर बनी रहती हैं या नहीं, और क्या राजनयिक प्रयास क्षेत्र को स्थिर करने में सफल होते हैं।
