बाजार की चाल और AI का जोर, फंड का बदला नज़रिया
यह रणनीतिक बदलाव 2025 में भारतीय शेयर बाज़ारों के प्रदर्शन में आई नरमी और फंड की ओवरऑल 15% की मजबूत कमाई के बीच हुआ। जहाँ भारतीय शेयर बाज़ारों में -1.4% की गिरावट देखी गई, वहीं नॉर्वे के फंड ने अपने पोर्टफोलियो का भार भारत से लगभग 40 बेसिस पॉइंट कम किया, जिससे साल के अंत तक यह 2.1% पर आ गया। फंड की रणनीति, FTSE ग्लोबल ऑल कैप इंडेक्स के अनुसार, प्रदर्शन और बाजार मूल्य के आधार पर स्वचालित रूप से भार समायोजित करती है। नतीजतन, कमजोर प्रदर्शन वाले बाज़ारों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता है, जबकि मजबूत बाज़ारों का महत्व बढ़ जाता है।
ताइवान और चीन की ओर बढ़ा फंड
2025 के खुलासों से पता चलता है कि फंड का झुकाव अन्य एशियाई बाजारों की ओर बढ़ा है। चीन में पोर्टफोलियो का भार लगभग 30 बेसिस पॉइंट बढ़कर 3.6% हो गया, और ताइवान का भार लगभग 20 बेसिस पॉइंट बढ़कर 2.7% हो गया। अब ताइवान का आवंटन भारत की घटाई गई हिस्सेदारी से काफी आगे निकल गया है।
इस बदलाव के पीछे के मुख्य कारण परफॉरमेंस में बड़ा अंतर है। ताइवान के इक्विटी मार्केट, खासकर TAIEX, ने असाधारण मजबूती दिखाई, जो AI (Artificial Intelligence) की ग्लोबल डिमांड और सेमीकंडक्टर की बढ़ती मांग से प्रेरित थी। TAIEX इंडेक्स ने साल भर में लगभग 27% का रिटर्न दिया। चीन के बाज़ारों में भी रिकवरी दिखी, CSI 300 इंडेक्स 18% और हैंग सेंग इंडेक्स 28% चढ़ा, जिसे अमेरिका के साथ टैरिफ सुलह और सरकारी स्टिमुलस (stimulus) का सहारा मिला।
भारत का धीमा प्रदर्शन और वैल्यूएशन का खेल
वहीं, भारत के शेयर बाज़ारों ने 2025 का अंत रुपये के हिसाब से लगभग 10-11% की मामूली बढ़त के साथ किया। लेकिन डॉलर के हिसाब से रिटर्न केवल 4-5% रहा, जो इसे साल के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले प्रमुख शेयर बाज़ार में से एक बनाता है। इस कमजोरी की एक बड़ी वजह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का लगभग $18 बिलियन का भारी आउटफ्लो रहा। इसके अलावा, भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले ₹85 से गिरकर ₹90 पर आ गया।
चिंता की बात यह है कि भारत का वैल्यूएशन (valuations) अन्य प्रतिस्पर्धियों की तुलना में काफी महंगा दिख रहा है। निफ्टी 50 का फॉरवर्ड P/E रेश्यो लगभग 20.5x था, जबकि कंज्यूमर इंडेक्स 44x पर ट्रेड कर रहा था। वहीं, चीन का मार्केट P/E 11-15x के बीच था। ताइवान का मार्केट P/E लगभग 26.6x पर था।
एडलवाइस की चिंताएँ और एफपीआई का दबाव
नॉर्वे के फंड ने हाल के वर्षों में फिक्स्ड इनकम से इक्विटी की ओर अपना रुझान बढ़ाया था, अब इसमें 5% से भी कम फिक्स्ड इनकम है। हालाँकि, भारत की आवंटन में कमी के पीछे कुछ और भी कारण हैं। नवंबर 2024 में, US SEC ने अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड के गौतम और सागर अडानी के खिलाफ आरोप लगाए, जिसमें सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने की बात कही गई थी। हालांकि अडानी ग्रीन एनर्जी ने आरोपों को खारिज किया है, लेकिन यह घटना विदेशी निवेशकों के बीच नियामक और गवर्नेंस (governance) को लेकर चिंताएं बढ़ा सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारत का घरेलू बाज़ार अन्य उभरते देशों से पिछड़ता रहा, तो वैश्विक पोर्टफोलियो में इसकी हिस्सेदारी पर दबाव बना रह सकता है। अगले कुछ समय के लिए बाज़ार की चाल रेंज-बाउंड रहने की उम्मीद है। डॉलर के लिहाज से भारत का कमजोर प्रदर्शन और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली यह संकेत देती है कि ओवरसीज इन्वेस्टर्स के लिए फिलहाल यह कम आकर्षक हो रहा है।
आगे क्या?
लंबे समय में भारत की डेमोग्राफिक्स (demographics) और सुधरते रिफॉर्म्स (reforms) के चलते निवेश की अच्छी संभावनाएं हैं, लेकिन तत्काल परिदृश्य सतर्कता भरा है। कुछ विश्लेषकों को 2026 की दूसरी छमाही से बाज़ार में रैली की उम्मीद है, जो आर्थिक संकेतकों और अर्निंग ग्रोथ (earnings growth) में सुधार पर निर्भर करेगी। नोमुरा (Nomura) का अनुमान है कि निफ्टी 2026 के अंत तक 29,300 तक पहुँच सकता है, जो 12% रिटर्न का संकेत देता है।