India-Norway Green Deal: नॉर्वे का पैसा भारत की हरित क्रांति में लगेगा? सीतारमण ने खोले रास्ते

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
India-Norway Green Deal: नॉर्वे का पैसा भारत की हरित क्रांति में लगेगा? सीतारमण ने खोले रास्ते
Overview

भारत नॉर्वे से, खासकर वहां के सॉवरेन वेल्थ फंड (SWF) और पेंशन फंड से, हरित ऊर्जा (Green Economy) और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में ज्यादा निवेश लाने की कोशिश कर रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नॉर्वे के अधिकारियों के साथ हुई बातचीत में इस बात पर जोर दिया।

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में ओस्लो में नॉर्वे के बड़े निवेशकों और बिजनेस लीडर्स से मुलाकात की। इसका मुख्य मकसद नॉर्वे के भारी-भरकम फंड को भारत की बढ़ती ग्रीन इकॉनमी और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग में लाना है।

यह बातचीत हाल ही में हुए इंडिया-ईएफटीए ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) जैसे व्यापारिक समझौतों का फायदा उठाने पर केंद्रित थी, ताकि लंबे समय के लिए निवेश के रास्ते खोले जा सकें। खास तौर पर रिन्यूएबल एनर्जी, कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी और रेयर अर्थ्स जैसे सेक्टर्स में सहयोग की बात हुई।

नॉर्वे के पास खजाने की कमी नहीं है। उनके गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल (GPFG) जैसे सॉवरेन वेल्थ फंड दुनिया के सबसे बड़े फंडों में से एक हैं, जिसकी वैल्यू $1.7 ट्रिलियन से ज्यादा है। यह फंड पहले से ही भारतीय शेयर बाजारों (Indian Equities) में $24 बिलियन के करीब निवेश कर चुका है, जो पिछले साल के मुकाबले 40% ज्यादा है। नॉर्वे का एक और फंड, Norfund, भारत के रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश कर रहा है।

नॉर्वे खास तौर पर भारत के रिन्यूएबल एनर्जी लक्ष्यों में दिलचस्पी ले रहा है। इसके अलावा, कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) सेक्टर पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है। भारत सरकार ने 2026-27 के बजट में CCUS के लिए अगले 5 सालों में ₹20,000 करोड़ (करीब $2.2 बिलियन) का फंड रखा है, ताकि इस टेक्नोलॉजी को बढ़ावा दिया जा सके। इसके अलावा, रेयर अर्थ्स (Rare Earths) और ब्लू इकॉनमी (Blue Economy) यानी समुद्री अर्थव्यवस्था से जुड़े प्रोजेक्ट्स में भी सहयोग के मौके तलाशे जा रहे हैं।

हालांकि, अच्छी बातों के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। बड़े पैमाने पर CCUS टेक्नोलॉजी को लागू करने में दिक्कतें आ सकती हैं, क्योंकि भारत अभी भी कोयले पर काफी निर्भर है। टेक्नोलॉजी का विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना, साथ ही कार्बन क्रेडिट्स को लेकर नियमों का साफ होना, यह सब बड़े सवाल हैं।

इंडिया-ईएफटीए TEPA से भारी निवेश आने की उम्मीद है, लेकिन यह तभी होगा जब भारत की GDP ग्रोथ अच्छी बनी रहे। ऐतिहासिक तौर पर, EFTA देशों से आने वाला फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) बाकी देशों के मुकाबले थोड़ा कम रहा है। इसलिए, इन वादों को असल निवेश में बदलने के लिए भरोसा और साफ प्रोजेक्ट्स का होना जरूरी है।

इन चुनौतियों के बावजूद, भारत की पॉलिसी और बड़ा घरेलू बाजार इसे लॉन्ग-टर्म निवेश के लिए एक आकर्षक डेस्टिनेशन बनाते हैं। नॉर्वे के साथ बातचीत यह दर्शाती है कि भारत अपने वित्तीय संबंधों को मजबूत करना चाहता है और बड़े डेवलपमेंट एजेंडा के लिए 'धैर्यवान पूंजी' (Patient Capital) आकर्षित करना चाहता है। TEPA का सफल इंटीग्रेशन और एफडीआई (FDI) नियमों का और आसान होना, उम्मीद है कि भविष्य में और ज्यादा पैसा भारत आएगा। सस्टेनेबल डेवलपमेंट और ग्रीन ग्रोथ पर जोर, खासकर CCUS जैसे नए सेक्टर्स में सरकारी समर्थन, भारत को लंबी अवधि के लिए अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के लिए एक बेहतरीन मौका देता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.