अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट ने F, J, और I वीज़ा नियमों को सख्त कर दिया है। अब कोर्स पूरा होने के बाद मिलने वाला ग्रेस पीरियड 60 दिन से घटाकर 30 दिन कर दिया गया है। इस बदलाव का भारतीय छात्रों और अकादमिक आगंतुकों पर असर पड़ेगा, जिसके चलते भारत सरकार अमेरिकी अधिकारियों के साथ बातचीत कर रही है।
US वीज़ा नियमों में बड़ा बदलाव
अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (Department of Homeland Security) ने गैर-आप्रवासी वीज़ा (non-immigrant visa) धारकों के लिए नए और सख्त नियम लागू किए हैं। इस फैसले का सीधा असर अमेरिका में मौजूद या वहां जाने की योजना बना रहे भारतीय छात्रों और अकादमिक आगंतुकों पर पड़ेगा। ये नए नियम कुछ वीज़ा धारकों को देश में ज़्यादा समय तक रहने की अनुमति देने वाली पुरानी नीति की जगह लेंगे। अब नए दिशानिर्देशों के तहत, रहने की समय-सीमा तय कर दी गई है।
F, J, और I वीज़ा धारकों पर क्या होगा असर?
यह बदला हुआ नियम खासकर F, J, और I वीज़ा श्रेणियों को प्रभावित करेगा। इनमें छात्र, अकादमिक एक्सचेंज विजिटर और मीडिया पेशेवर शामिल हैं। सबसे बड़ा बदलाव डिग्री या प्रोग्राम पूरा होने के बाद मिलने वाले ग्रेस पीरियड (grace period) को लेकर है। पहले F वीज़ा धारकों (जो ज़्यादातर अंतर्राष्ट्रीय छात्र होते हैं) को ग्रेजुएशन के बाद देश छोड़ने, किसी दूसरी यूनिवर्सिटी में ट्रांसफर लेने या कानूनी स्थिति बदलने के लिए आवेदन करने के लिए 60 दिन का समय मिलता था। अब इस समय-सीमा को घटाकर 30 दिन कर दिया गया है।
इस बदलाव से छात्रों पर प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करने का दबाव बढ़ जाएगा, जैसे कि एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड वीज़ा (employment-based visa) हासिल करना या आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला लेना। अगर छात्र इस नए 30 दिन के विंडो में यह सब नहीं कर पाते हैं, तो वे अपनी कानूनी स्थिति खो सकते हैं, जिससे उनके लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है।
भारत सरकार की पहल
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल (Randhir Jaiswal) ने शुक्रवार को इस नीतिगत बदलाव पर बात की। उन्होंने स्वीकार किया कि आप्रवासन और वीज़ा नीतियां किसी भी देश का संप्रभु अधिकार हैं। जायसवाल ने पुष्टि की कि नई दिल्ली अमेरिकी अधिकारियों के साथ सक्रिय रूप से बातचीत कर रही है। भारतीय सरकार का उद्देश्य इन बदलावों से वास्तविक यात्रियों और छात्रों को होने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को उजागर करना है। मंत्रालय ने यह भी कहा है कि वे उन मामलों में हस्तक्षेप करेंगे जहां भारतीय नागरिकों को अनुचित कठिनाई का सामना करना पड़ता है, ताकि उनके बदलाव की प्रक्रिया आसान बनी रहे।
निवेशकों और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
शिक्षा और यात्रा जैसे क्षेत्र अक्सर ऐसे नीतिगत बदलावों से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। भारतीय निवेशकों के लिए यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दोनों देशों के बीच प्रतिभा के आवागमन में संभावित बदलावों को दर्शाती है। ऐतिहासिक रूप से, अमेरिका भारतीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा, खासकर STEM और बिज़नेस के क्षेत्र में, प्रमुख गंतव्य रहा है। बढ़ती नियामक बाधाएं छात्र प्रवासन के दीर्घकालिक रुझानों को प्रभावित कर सकती हैं, जिसका असर ed-tech कंपनियों, स्टडी-अब्रोड कंसल्टेंट्स और अंतर्राष्ट्रीय भर्ती फर्मों के बिज़नेस मॉडल पर पड़ सकता है।
निवेशक इस बात पर नज़र रख सकते हैं कि क्या ये सख्त नियम छात्रों को अन्य देशों की ओर आकर्षित करते हैं, जहां पोस्ट-स्टडी वर्क (post-study work) या निवास की नीतियां ज़्यादा लचीली हैं। इस क्षेत्र पर अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय सरकार की राजनयिक कोशिशें छात्रों के लिए इन नई अनुपालन बाधाओं को कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से कम कर पाती हैं।
