नेपाल ने अपनी फॉरेन पॉलिसी में बड़ा बदलाव करते हुए विचारधारा के बजाय भारत के साथ ट्रेड और कनेक्टिविटी को प्राथमिकता देने का ऐलान किया है। इस नए रोडमैप के तहत, नेपाल **2035** तक **28,000 MW** हाइड्रोपावर क्षमता का लक्ष्य लेकर चल रहा है, जिसका सीधा फायदा भारत की बढ़ती बिजली मांग को मिलेगा।
आर्थिक सहयोग का नया युग
नेपाल अब अपनी कूटनीति को पूरी तरह से आर्थिक सहयोग की ओर मोड़ रहा है। इस कदम का सीधा असर भारतीय मार्केट के एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर पर देखने को मिल सकता है। नेपाल का फोकस अब उन बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर है, जिनमें भारत की कई पब्लिक और प्राइवेट कंपनियां पहले से ही जुड़ी हुई हैं। 2035 तक 28,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन का लक्ष्य न केवल नेपाल के लिए अहम है, बल्कि यह भारत के इंडस्ट्रियल डीकार्बोनाइजेशन के लक्ष्य को भी सपोर्ट करेगा।
कनेक्टिविटी और ट्रेड का विस्तार
सिर्फ बिजली ही नहीं, बल्कि तराई रीजन की कनेक्टिविटी को भी भारतीय इकोनॉमी के साथ बेहतर ढंग से जोड़ने की योजना है। बॉर्डर के पास नए इकोनॉमिक जोन बनाने और लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर को मजबूत करने से क्रॉस-बॉर्डर सप्लाई चेन का खर्च कम होगा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश के नए मौके खुलेंगे।
निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर
मार्केट के जानकारों का मानना है कि यह बदलाव पॉजिटिव है, लेकिन पुराने इतिहास को देखते हुए राजनीतिक अस्थिरता का जोखिम हमेशा बना रहता है। बड़े प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन और प्रशासनिक कुशलता ही यह तय करेगी कि यह प्लान जमीनी हकीकत में कितनी जल्दी बदलता है। निवेशकों को फिलहाल क्रॉस-बॉर्डर ट्रांसमिशन लाइन्स और सरकारी एग्रीमेंट्स की प्रोग्रेस पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही इस पूरे बदलाव के असली 'ट्रिगर पॉइंट्स' साबित होंगे।
