नेपाल में ग्लेशियर फटने से आई तबाही ने भारी कोहराम मचाया है। इस प्राकृतिक आपदा में **538** लोगों की जान गई है और करीब **748 MW** की हाइड्रोपावर क्षमता प्रभावित हुई है, जिससे Nepal Stock Exchange में जोरदार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास एक विशाल ग्लेशियर के टूटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे नेपाल में कोहराम मचा दिया है। 28 अगस्त, 2026 तक आधिकारिक तौर पर मरने वालों का आंकड़ा 538 तक पहुंच गया है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी बेसिन में आई इस बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है, हालांकि राहत की बात यह है कि 85 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाल लिया गया है।
पावर सेक्टर और इंफ्रास्ट्रक्चर पर चोट
आर्थिक मोर्चे पर सबसे बड़ी चिंता पावर सेक्टर को लेकर है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की 748 MW की कुल क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा है। नेपाल के ऊर्जा ग्रिड के लिए यह एक बड़ा झटका है, जिससे न केवल तत्काल बिजली की सप्लाई बाधित हो सकती है, बल्कि इन प्रोजेक्ट्स को दोबारा खड़ा करने की लागत भी काफी ज्यादा रहने की आशंका है। इसके अलावा, व्यापार और कनेक्टिविटी के लिए जरूरी सड़कों और पुलों के बह जाने से सप्लाई चेन पर भी गहरा असर पड़ा है।
मार्केट और निवेशकों पर असर (Investor Radar)
इस आपदा के बाद Nepal Stock Exchange (NEPSE) में तेज उतार-चढ़ाव का माहौल है। निवेशकों की नजरें खासतौर पर इंश्योरेंस और हाइड्रोपावर कंपनियों के शेयरों पर टिकी हैं, क्योंकि इन्हें सबसे ज्यादा नुकसान की आशंका है। आने वाली तिमाहियों में बीमा कंपनियों के प्रॉफिट पर भी इसका असर दिख सकता है। हालांकि, नेपाल में काम कर रही भारतीय FMCG कंपनियों ने अभी तक किसी बड़े नुकसान की रिपोर्ट नहीं दी है, लेकिन डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में बाधा के चलते शेयरधारकों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है।
आगे का रिस्क और मॉनिटरिंग
अथॉरिटीज ने अभी भी हाई अलर्ट जारी रखा है। ग्लेशियर टूटने के बाद बने अस्थिर मलबे के बांधों के कारण दोबारा बाढ़ आने का खतरा बना हुआ है। जियोलॉजिकल अस्थिरता के चलते हिमालयी क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों के लिए रिस्क प्रोफाइल बढ़ गया है। अब मार्केट की नजर इस बात पर है कि सरकार कितनी जल्दी इंफ्रास्ट्रक्चर को बहाल करती है और रिकंस्ट्रक्शन के लिए उन्हें कितनी अतिरिक्त फंडिंग की जरूरत पड़ती है। यूटिलिटी कंपनियों के लिए अपनी कैपेसिटी को बिना लागत के बोझ को बढ़ाए बहाल करना रिकवरी का सबसे बड़ा पैमाना होगा।
