प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की 15 मई की यात्रा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव गहरा गया है। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, जिसमें Brent crude $107.59 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहा है। यह पिछले साल के मुकाबले 61.48% की बड़ी बढ़ोतरी है, जो सप्लाई चेन की कमजोरियों, खासकर Strait of Hormuz जैसे अहम समुद्री मार्ग को लेकर बढ़ी चिंताओं को दर्शाती है। भारत, जो अपनी 85% से अधिक तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इन बाजार के उतार-चढ़ावों से सीधे तौर पर प्रभावित होता है, जिससे महंगाई बढ़ने और चालू खाते के घाटे (current account deficit) में इजाफा होने का खतरा है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति हमेशा से आयात पर इसकी निर्भरता से जूझती रही है। ऐतिहासिक रूप से, भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 45% मध्य पूर्व से आता था, जिसमें से बड़ा हिस्सा Strait of Hormuz से गुजरता था। हाल के पश्चिम एशियाई घटनाक्रमों ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण मार्च 2026 तक कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल के करीब पहुंचने का अनुमान है। भारत अपनी तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। UAE, जो OPEC का एक प्रमुख सदस्य है और भारत को लगातार तेल आपूर्ति करता रहा है, इस मामले में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रधानमंत्री मोदी की पिछली UAE यात्राएं (2015 और 2018) भी द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और ऊर्जा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को गहरा करने पर केंद्रित थीं। UAE भी अपनी ऊर्जा पोर्टफोलियो में विविधता ला रहा है, जो भारत के लिए स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने में सहायक हो सकता है।
ऊर्जा बाजार पर कच्चे तेल के बेंचमार्क जैसे WTI crude, जो फिलहाल $102.05 प्रति बैरल के आसपास है, पर भी ऊपर की ओर दबाव बना हुआ है। पश्चिम एशिया में लगातार बनी अस्थिरता, खासकर Strait of Hormuz जैसे व्यापार मार्गों पर मंडरा रहा खतरा, अभूतपूर्व बाजार अस्थिरता पैदा कर रहा है, जो 1970 के दशक के तेल संकटों से भी आगे निकल गई है। इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है; तेल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी पर भारत का आयात बिल $15–20 अरब तक बढ़ सकता है। इस बीच, भारत के Nifty Energy Index ने 12 मई, 2026 को 1.25% की गिरावट दर्ज की, जो व्यापक बाजार की अनिश्चितताओं को दर्शाती है।
विविधीकरण (diversification) के प्रयासों और रणनीतिक साझेदारी के बावजूद, भारत की ऊर्जा आपूर्ति में महत्वपूर्ण कमजोरियां बनी हुई हैं। जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता, जो भारत की प्राथमिक ऊर्जा जरूरतों का लगभग 75% है, एक संरचनात्मक कमजोरी है। हालांकि पश्चिम एशिया से कच्चे तेल के आयात का हिस्सा 60% से घटकर 45% से कम हो गया है, लेकिन नई निर्भरताएं उभर रही हैं। बढ़ते पश्चिम एशियाई संघर्ष ने दिखाया है कि आपूर्ति में व्यवधान गंभीर मुद्रास्फीति, व्यापार लागत में वृद्धि और मुद्रा के अवमूल्यन (currency depreciation) का कारण बन सकते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की UAE के साथ यह सहभागिता भारत की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और दीर्घकालिक सहयोग की संभावनाओं को तलाशने की दिशा में एक सक्रिय कदम है। चर्चाओं में पारंपरिक समुद्री मार्गों से बचने वाले वैकल्पिक रास्तों और अन्वेषण (exploration) व डाउनस्ट्रीम (downstream) परियोजनाओं में बढ़े हुए निवेश और संयुक्त उद्यमों (joint ventures) पर ध्यान केंद्रित होने की उम्मीद है। जैसे-जैसे भारत अपनी नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा कर रहा है, स्थिर और किफायती ऊर्जा आयात सुनिश्चित करना सर्वोपरि है। UAE के साथ साझेदारी भारत की ऊर्जा सुरक्षा में अधिक लचीलापन (resilience) लाने और उसके ऊर्जा संक्रमण (energy transition) लक्ष्यों का समर्थन करने में महत्वपूर्ण है।
