इजरायल के चुनावों में बेंजामिन नेतन्याहू का गुट बहुमत के जादुई आंकड़े **61** से पीछे रह गया है। इस राजनीतिक अनिश्चितता के बीच भारत के साथ चल रहे डिफेंस और टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट्स पर निवेशकों की नजरें टिकी हैं।
इजरायल में हालिया संसदीय चुनावों के नतीजे किसी स्पष्ट बहुमत के साथ नहीं आए हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को केवल 53 सीटें मिली हैं, जो सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 के आंकड़े से काफी दूर है। अब देश में गठबंधन बनाने के लिए जोर-आजमाइश का दौर शुरू हो गया है, जिसने दुनिया भर के रणनीतिक साझेदारों, विशेषकर भारत को सतर्क कर दिया है।\n\n### सत्ता का गणित और अनिश्चितता\n\nअब फैसला राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग के हाथों में है। नेतन्याहू को सरकार बनाने के लिए 42 दिनों की मोहलत दी गई है। यदि वे इसमें नाकाम रहते हैं, तो सत्ता की बागडोर विपक्ष के नेता गदी आइजनकोट के पाले में जा सकती है। यदि वहां भी सहमति नहीं बनी, तो इजरायल को फिर से चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। यह राजनीतिक अस्थिरता अक्सर सरकारी फैसलों, प्रोजेक्ट अप्रूवल और अंतरराष्ट्रीय समझौतों में प्रशासनिक देरी का कारण बनती है।\n\n### डिफेंस और स्ट्रैटेजिक रिश्तों पर प्रभाव\n\nभारत के लिए इजरायल एक अहम डिफेंस पार्टनर है। दोनों देशों के बीच सर्विलांस टेक्नोलॉजी से लेकर एयर डिफेंस सिस्टम तक गहरा सहयोग है। हालांकि, ये संबंध संस्थागत ढांचे पर आधारित हैं और दशकों से स्थिर रहे हैं, फिर भी सरकार के लंबे समय तक 'केयरटेकर मोड' में रहने से नई जॉइंट वेंचर्स या डिफेंस टेक्नोलॉजी ट्रांसफर समझौतों की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।\n\n### औद्योगिक सहयोग का भविष्य\n\nनिवेशकों के लिए अब मुख्य फोकस इस बात पर है कि क्या इजरायल की अस्थिरता भारत की 'लोकल मैन्युफैक्चरिंग' और 'टेक्नोलॉजी ट्रांसफर' की योजनाओं को प्रभावित करेगी। फिलहाल रणनीतिक रिश्ते तो मजबूत दिख रहे हैं, लेकिन किसी भी बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट या सरकारी बातचीत में देरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। मार्केट के जानकारों के मुताबिक, जब तक इजरायल में स्थिर सरकार का गठन नहीं हो जाता, तब तक किसी भी नए बड़े फैसले पर संशय बना रह सकता है।
