ईरान से जुड़ा एक **$2 बिलियन** का प्रोक्योरमेंट नेटवर्क सामने आया है, जो **5,000** से ज्यादा फर्जी कंपनियों के जरिए मिलिट्री और इंडस्ट्रियल सामान खरीद रहा है। इस खबर ने ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स के लिए बड़े कंप्लायंस (Compliance) और रेपुटेशनल रिस्क खड़े कर दिए हैं।
शैडो सप्लाई चेन का सच
यह प्रोक्योरमेंट सिस्टम एक समानांतर ट्रेड स्ट्रक्चर की तरह काम कर रहा है, जिसे बैंकिंग और एक्सपोर्ट कंट्रोल्स से बचने के लिए बनाया गया है। इसमें 5,000 से ज्यादा शेल कंपनियों और बिचौलियों का इस्तेमाल किया गया है। हैरानी की बात यह है कि लगभग 97% ट्रांजैक्शंस में सीधे करेंसी ट्रांसफर का इस्तेमाल नहीं किया गया, जिससे ये सौदे रडार से बाहर रहे।
ग्लोबल कंपनियों पर संकट
निवेशकों के लिए चिंता की बात यह है कि इसमें Iveco और Toyota जैसी दिग्गज कंपनियों के वाहनों का इस्तेमाल होता पाया गया है। हालांकि कंपनियों का कहना है कि ये सेल्स उनके कंट्रोल से बाहर के बिचौलियों के जरिए हुई हैं, लेकिन इनके प्रोडक्ट्स का मिलिट्री प्लेटफॉर्म्स के लिए इस्तेमाल होना कंपनी की छवि और कानूनी स्थिति पर गंभीर सवाल उठाता है।
रेगुलेटर्स अब 'Know-your-distributor' प्रोटोकॉल को और सख्त कर रहे हैं। यदि किसी कंपनी के प्रोडक्ट्स प्रतिबंधित क्षेत्रों में पाए जाते हैं, तो उन्हें अनिवार्य ऑडिट और भारी दबाव का सामना करना पड़ सकता है, जिससे कंपनी के ऑपरेटिंग खर्चों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
यह घटना सप्लाई चेन की जटिलता और जियोपॉलिटिकल जोखिमों को दर्शाती है। जो निवेशक ऑटोमोटिव, इंडस्ट्रियल और टेक्नोलॉजी सेक्टर में पैसा लगाए हुए हैं, उन्हें अब मैनेजमेंट के 'एक्सपोर्ट कंप्लायंस' बयानों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। भविष्य में, जो कंपनियां अपनी सप्लाई चेन की पारदर्शिता और अनुपालन (Compliance) में बेहतर साबित होंगी, उन्हीं में लॉन्ग-टर्म रिस्क कम रहने की उम्मीद है।
