ईरान में दवाओं की गंभीर किल्लत और बिगड़ते लॉजिस्टिक्स ने फार्मा सेक्टर के सामने नए खतरे खड़े कर दिए हैं। भारतीय निवेशकों के लिए यह सतर्क होने का समय है, क्योंकि हाई-रिस्क वाले देशों में एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों के कैश-फ्लो पर दबाव बढ़ सकता है।
ईरान में जारी मेडिकल सप्लाई संकट अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। कड़े प्रतिबंधों और क्षेत्रीय नाकेबंदी (Blockades) के कारण वहां जरूरी दवाओं की भारी किल्लत हो गई है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि पारंपरिक शिपिंग रूट बंद हैं और एयर ट्रांसपोर्ट का खर्च आसमान छू रहा है। इसके अलावा, वहां की करेंसी की वैल्यू गिरने और महंगाई बढ़ने से दवाओं की पहुंच आम लोगों से दूर होती जा रही है।
भारतीय फार्मा एक्सपोर्टर्स के लिए चुनौतियां
भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा निर्यातक है और ईरान हमेशा से भारतीय दवा कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार रहा है। लेकिन, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की चपेट में आए देशों के साथ व्यापार करना अब बेहद जोखिम भरा हो गया है। सबसे बड़ी समस्या 'पेमेंट सेटलमेंट' की है। जब अंतरराष्ट्रीय बैंक और शिपिंग कंपनियां प्रतिबंधों के डर से किनारा कर लेती हैं, तो भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए अपना पैसा वापस लाना (Repatriate earnings) मुश्किल हो जाता है। इससे कंपनियों की बैलेंस शीट में 'अकाउंट्स रिसीवेबल' यानी बकाया पैसा बढ़ जाता है, जो कंपनी के कैश फ्लो को पूरी तरह से बिगाड़ सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
हालांकि बड़ी भारतीय फार्मा कंपनियों ने अपने रिस्क को कम करने के लिए मार्केट डायवर्सिफाई किया है, लेकिन जियोपॉलिटिकल अस्थिरता एक बड़ा रिस्क बनी हुई है। निवेशकों को कंपनी की एनुअल रिपोर्ट में यह जरूर देखना चाहिए कि कंपनी का कितना रेवेन्यू हाई-रिस्क वाले देशों से आ रहा है।
इसके अलावा, मुद्रा (Currency) में गिरावट का सीधा असर मुनाफे के मार्जिन (Profit Margins) पर पड़ता है। अगर किसी कंपनी का बड़ा एक्सपोर्ट ऐसे अस्थिर देशों में है, तो वहां से पेमेंट मिलने में देरी या बैड डेट्स (Bad Debts) होने की संभावना बढ़ जाती है। लंबी अवधि के निवेश के लिए यह समझना जरूरी है कि कंपनी कैसे इन ट्रेड बैरियर्स और पेमेंट संकटों से निपट रही है।
