स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: ग्लोबल एनर्जी सप्लाई की जीवनरेखा
यह जलमार्ग दुनिया की लगभग 20% तेल और LNG सप्लाई के लिए बेहद अहम है। हालिया घटनाओं ने इस महत्वपूर्ण रास्ते पर गंभीर रुकावट पैदा कर दी है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के चलते शिपिंग (Shipping) में भारी कमी आई है। अनुमान है कि रोजाना 75 लाख से 130 लाख बैरल तक कच्चे तेल और रिफाइंड प्रोडक्ट्स की सप्लाई बाधित हो रही है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने इसे आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी सप्लाई में रुकावट बताया है।
मार्केट में हलचल, क्रूड ऑयल की कीमतें चढ़ीं
इस खबर के बाद Brent क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल के पार निकल गया है और $111 के करीब ट्रेड कर रहा है, जबकि West Texas Intermediate (WTI) भी $100 के आसपास बना हुआ है। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) जैसे बड़े ब्रोकरेज हाउस ने चौथी तिमाही के लिए तेल की कीमतों के अनुमान बढ़ा दिए हैं। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद रहता है, तो Brent क्रूड $125-$150 या उससे भी ऊपर जा सकता है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ग्लोबल स्पेयर प्रोडक्शन कैपेसिटी (Global Spare Production Capacity) सीमित होने के कारण कीमतें कई सालों तक ऊंची बनी रह सकती हैं। IEA ने भी आगाह किया है कि मार्केट इस रुकावट के पूरे असर को कम आंक रहा है।
सप्लाई से आगे: इकोनॉमी पर गहरा असर
यह लंबे समय तक चलने वाली रुकावट सिर्फ क्रूड ऑयल की कीमतों पर ही नहीं, बल्कि पूरी ग्लोबल इकोनॉमी पर भारी पड़ रही है। IEA के मुताबिक, तेल और गैस दोनों बाजारों में एक साथ तनाव बढ़ रहा है, जिससे कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और LNG सप्लाई में देरी हो रही है। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और विकासशील देशों पर पड़ेगा, जहाँ बढ़ी हुई एनर्जी और फूड की कीमतों से महंगाई बढ़ेगी और इकोनॉमिक ग्रोथ धीमी होगी। इतिहास गवाह है कि तेल की कीमतों में बड़ी उछाल अक्सर इकोनॉमिक मंदी (Recession) का कारण बनती है। यह स्थिति 1970 के तेल संकट और रूस-यूक्रेन युद्ध से भी गंभीर हो सकती है।
अनदेखे रिस्क और मार्केट की चाल
फिलहाल मार्केट का ध्यान सिर्फ सप्लाई के मौजूदा आंकड़ों पर है, लेकिन लंबे समय तक नाकाबंदी से जुड़े बड़े रिस्क को नजरअंदाज किया जा रहा है। जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम (Geopolitical Risk Premium) कम आंका जा सकता है। ट्रेडर्स (Traders) बड़े पैमाने पर सप्लाई में रुकावट के हालात को ध्यान में रख रहे हैं, लेकिन लगातार ऊंची एनर्जी लागत के दूरगामी असर – जैसे कंज्यूमर डिमांड में कमी, इंडस्ट्रियल एक्टिविटी का धीमा होना और बढ़ती महंगाई – असल सप्लाई के आंकड़ों से कहीं ज्यादा बड़े खतरे पैदा करते हैं। सीमित ग्लोबल स्पेयर प्रोडक्शन कैपेसिटी के चलते, किसी भी नए शॉक या लंबे समय तक अनिश्चितता से कीमतें और भी तेजी से बढ़ सकती हैं।
आगे क्या? तेल कीमतों का आउटलुक
एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि मीडियम टर्म (Medium Term) में तेल की कीमतें वोलेटाइल (Volatile) और ऊंची बनी रहेंगी। 2026 के आखिर तक Brent के $90 और WTI के $82 रहने का अनुमान है, बशर्ते कि मई 2026 तक कुछ डी-एस्केलेशन (De-escalation) हो जाए। लेकिन, अगर यह तनाव बढ़ता है या सप्लाई में रुकावट लंबी खिंचती है, तो कीमतें इससे कहीं ज्यादा ऊंची बनी रह सकती हैं। वर्ल्ड बैंक (World Bank) का अनुमान है कि 2026 में Brent का एवरेज दाम $86 रहेगा, लेकिन यह इस अनुमान पर आधारित है कि मौजूदा बड़े संकट मई तक खत्म हो जाएंगे – जो कि मौजूदा हालात को देखते हुए आशावादी लगता है। जब तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तनाव का केंद्र बना रहेगा, ग्लोबल एनर्जी सिस्टम को सप्लाई शॉक और लगातार महंगाई का सामना करना पड़ेगा।
