इंडोनेशिया 17 अक्टूबर, 2026 से आयातित सामानों के लिए अनिवार्य हलाल सर्टिफिकेशन लागू कर रहा है। इससे भारतीय फूड, फार्मा और कॉस्मेटिक कंपनियों को सख्त ऑडिट से गुजरना होगा, जिससे लागत और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ सकता है।
इंडोनेशिया अपनी नई 'वाजिब हलाल अक्टूबर 2026' (WHO 2026) नीति के तहत बड़े स्तर पर रेगुलेटरी बदलाव कर रहा है। 17 अक्टूबर, 2026 से प्रभाव में आने वाले इस नियम के मुताबिक, इंडोनेशिया में आने वाले सभी प्रोसेस्ड फूड, एग्री प्रोडक्ट्स, फार्मा और कॉस्मेटिक उत्पादों के लिए हलाल सर्टिफिकेट अनिवार्य होगा।
नई कंप्लायंस चुनौतियां
यह नया बदलाव पुराने नियमों से बिल्कुल अलग है, क्योंकि अब कंपनियां सेल्फ-डिक्लेरेशन नहीं कर पाएंगी। नए रेगुलेशन 'BPJPH No. 4/2026' के तहत विदेशी उत्पादों को शिपमेंट से पहले ऑडिट कराना होगा। कंपनियों को अपने पूरे सप्लाई चेन, जिसमें रॉ मटेरियल और मैन्युफैक्चरिंग एडिटिव्स शामिल हैं, की जानकारी देनी होगी। इसे 'SIHALAL' पोर्टल पर रजिस्टर करना होगा, जो खासकर फार्मा कंपनियों के लिए कठिन है क्योंकि इसमें दवाओं में इस्तेमाल होने वाले जिलेटिन और अल्कोहल-बेस्ड फॉर्मूलेशन की बारीकी से जांच होगी।
वित्तीय और ऑपरेशनल रिस्क
यह नियम ऐसे समय आया है जब भारत और इंडोनेशिया के बीच द्विपक्षीय व्यापार दबाव में है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में कुल व्यापार गिरकर $24.8 बिलियन पर आ गया है, जो 2022-23 में $38.8 बिलियन था। इस नए ऑडिट के खर्च से खासकर SME सेक्टर के मुनाफे पर असर पड़ सकता है। अगर कंपनियों के डॉक्यूमेंट्स में कमी पाई गई, तो सामान रिजेक्ट होने, बॉर्डर पर जब्त होने या प्रोडक्ट वापस बुलाने (Recalls) जैसे रिस्क बढ़ जाएंगे, जिससे भारी रेवेन्यू लॉस हो सकता है।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि भारतीय निर्यातक कितनी तेजी से इन नए नियमों के साथ तालमेल बिठाते हैं। फार्मा और एग्री कमोडिटी जैसे सेक्टरों में एक्सपोर्ट वॉल्यूम पर नजर रखना जरूरी है। बड़ी कंपनियों के लिए शायद यह एडजस्टमेंट आसान हो, लेकिन छोटी कंपनियों की ट्रेड ऑपरेशन्स में आने वाले समय में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
