भारत के खिलौना निर्यात पर वियतनाम की पकड़ मज़बूत, 8.26% ग्लोबल शेयर पर कब्ज़ा

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत के खिलौना निर्यात पर वियतनाम की पकड़ मज़बूत, 8.26% ग्लोबल शेयर पर कब्ज़ा

भारत के खिलौना निर्यात के क्षेत्र में बड़ी चुनौती सामने आ गई है। साल 2025 में जहाँ भारत का खिलौना निर्यात **$718 मिलियन** रहा और ग्लोबल मार्केट में **0.54%** की हिस्सेदारी हासिल की, वहीं वियतनाम एक मज़बूत प्रतियोगी के रूप में उभरा है। वियतनाम के पास फिलहाल ग्लोबल मार्केट का **8.26%** हिस्सा है, जो भारत के **5%** के लक्ष्य से कहीं ज़्यादा है।

Detailed Coverage

वियतनाम से कड़ी टक्कर

भारत की ग्लोबल टॉय मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की महत्वाकांक्षाओं पर उसके पड़ोसी देश बड़ा सवालिया निशान लगा रहे हैं। साल 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत का खिलौना निर्यात बढ़कर $718.3 मिलियन हो गया है, जो पिछले एक दशक में एक स्थिर बढ़ोतरी दिखाता है। लेकिन, इस बढ़ोतरी के बावजूद भारत ग्लोबल मार्केट में सिर्फ 0.54% हिस्सेदारी ही रख पाया है, जो सरकार के 5% शेयर के लक्ष्य से काफी कम है।

इसकी मुख्य वजह है वियतनाम जैसे देशों में इंडस्ट्री का तेज़ी से विस्तार। 2014 में जहाँ वियतनाम का खिलौना निर्यात $960 मिलियन था, वहीं 2025 तक यह $11.07 बिलियन के पार पहुँच गया। इस तेज़ रफ़्तार के चलते वियतनाम की ग्लोबल मार्केट में हिस्सेदारी 8.26% तक पहुँच गई। यह बड़ा बदलाव तब हुआ जब ग्लोबल खरीदार चीन से हटकर दूसरे देशों की ओर बढ़ने लगे, जिसका फायदा वियतनाम ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाकर और सप्लाई चेन को बेहतर बनाकर उठाया।

प्रमुख उत्पाद श्रेणियों में पिछड़ रहा भारत

अगर हम अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरीज़ पर नज़र डालें, तो पता चलता है कि भारत कहाँ पिछड़ रहा है। तिपहिया, स्कूटर और पैडल कार जैसी हाई-वॉल्यूम कैटेगरी में भारत की ग्लोबल हिस्सेदारी सिर्फ 0.52% है, जबकि वियतनाम 7.44% पर काबिज़ है। इलेक्ट्रॉनिक और गेमिंग इक्विपमेंट, जिसमें वीडियो गेम कंसोल भी शामिल हैं, के मामले में तो यह अंतर और भी बड़ा है। इस सेगमेंट में भारत की हिस्सेदारी महज़ 0.18% है, जबकि वियतनाम 13.01% पर हावी है। भारत सिर्फ फेस्टिव और कार्निवल आर्टिकल्स में 1.84% की हिस्सेदारी के साथ थोड़ा बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन यहाँ भी वियतनाम 1.99% के साथ थोड़ा आगे है।

मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने में चुनौतियाँ

भारतीय कंपनियों के लिए 5% ग्लोबल शेयर तक पहुँचने के लिए सिर्फ डोमेस्टिक डिमांड पर निर्भर रहना काफी नहीं होगा। इस सेक्टर में निवेशक आम तौर पर बड़े स्केल पर ऑटोमेटेड मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज़ की क्षमता पर नज़र रखते हैं, जो ग्लोबल रिटेलर्स की हाई-वॉल्यूम की ज़रूरतों को पूरा कर सकें। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय खिलौना उद्योग काफी बिखरा हुआ रहा है, जिससे इंटरनेशनल प्लेयर्स के मुकाबले कीमत पर कॉम्पिटिशन करने के लिए जरूरी इकोनॉमीज़ ऑफ़ स्केल हासिल करना मुश्किल हो गया है।

एक और चिंता का विषय है सप्लाई चेन इंटीग्रेशन। सफल एक्सपोर्टर्स अक्सर ऐसे स्पेशलाइज्ड ज़ोन्स में काम करते हैं जहाँ लॉजिस्टिक्स की सुविधाएँ और प्रमुख पोर्ट्स से नज़दीकी हो। यह देखना बाकी है कि क्या भारतीय मैन्युफैक्चरर्स इस तरह के फायदे हासिल कर पाते हैं। निवेशकों को सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम्स, नई मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में निवेश और बड़े इंटरनेशनल टॉय ब्रांड्स से बड़े ऑर्डर्स हासिल करने में इंडस्ट्री की सफलता से जुड़ी भविष्य की अपडेट्स पर नज़र रखनी चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक टॉय मैन्युफैक्चरिंग में गैप को भरने में भारतीय फर्म्स कितनी तेज़ी दिखाती हैं, यह भी सेक्टर की प्रगति का एक महत्वपूर्ण इंडिकेटर होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.