अमेरिका में वीज़ा के नियम सख्त होने और पढ़ाई का खर्च बढ़ने के कारण भारतीय छात्र अब यूरोप के देशों का रुख कर रहे हैं। जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे देश लोकप्रिय हो रहे हैं, क्योंकि वहां पढ़ाई सस्ती है और वीज़ा प्रक्रिया भी आसान है।
Detailed Coverage
अमेरिका से यूरोप की ओर छात्रों का पलायन
अमेरिका, जो लंबे समय से भारतीय छात्रों के लिए हायर एजुकेशन का सबसे पसंदीदा डेस्टिनेशन रहा है, अब इस मामले में पिछड़ता दिख रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि अमेरिका में पढ़ाई का खर्च बढ़ गया है और वीज़ा नियमों को लेकर अनिश्चितता छाई हुई है। इन सब वजहों से भारतीय छात्र-छात्राएं और उनके परिवार अब यूरोप की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं।
यूरोप में बढ़ी भारतीय छात्रों की संख्या
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, यूरोपीय संघ (EU) में लगभग 1,20,000 भारतीय छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। साल 2015 से 2023 के बीच यूरोप जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में 45% की बढ़ोतरी देखी गई है। खासकर जर्मनी, फ्रांस, इटली और आयरलैंड जैसे देशों में नामांकन में 68% का उछाल आया है। दूसरी ओर, अमेरिका जाने वाले छात्रों की रुचि में कमी आने की उम्मीद है।
जर्मनी भारतीय छात्रों के लिए एक बड़ा हब बनकर उभरा है, जहाँ 2024 तक 43,000 से ज़्यादा भारतीय छात्र पढ़ रहे हैं। यहां इंग्लिश में पढ़ाई के कोर्सेस की उपलब्धता और इंजीनियरिंग व रिसर्च जैसे क्षेत्रों में अच्छी पढ़ाई का माहौल है। इसी तरह, फ्रांस मैनेजमेंट कोर्सेस के लिए और नीदरलैंड्स वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए पसंद किए जा रहे हैं।
आर्थिक फायदे और कम खर्च
पैसों के मामले में भी यूरोप भारतीय छात्रों के लिए ज़्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है। कई यूरोपीय यूनिवर्सिटी की ट्यूशन फीस अमेरिका की तुलना में 50% से 80% तक कम है। भारतीय रुपये पर पड़ रहे दबाव को देखते हुए, यूरोपियन संस्थानों की यह कम फीस भारतीय परिवारों को बड़ी राहत दे रही है। ट्यूशन फीस के अलावा, कई यूरोपीय शहरों में रहने का खर्च भी अमेरिका के बड़े शहरों की तुलना में काफी कम है।
हाल ही में हुए पॉलिसी बदलावों ने भी इस बदलाव को बढ़ावा दिया है। इंडिया-ईयू मोबिलिटी फ्रेमवर्क (India-EU mobility framework) ने वीज़ा प्रक्रिया को आसान बनाया है और भारतीय डिग्री की मान्यता को भी बढ़ाया है। इन बदलावों से छात्रों के लिए यूरोप को पढ़ाई और उसके बाद करियर के लिए एक बेहतर विकल्प के तौर पर देखना आसान हो गया है।
आगे की राह और चुनौतियां
यूरोप की ओर यह रुझान काफी मजबूत दिख रहा है, लेकिन छात्रों को कुछ चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है। खास स्किल्स और स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से ढलने की क्षमता रोज़गार के अवसरों को प्रभावित कर सकती है। इंग्लिश-टॉट कोर्सेस के अलावा दूसरी भाषाओं की रुकावट और एम्स्टर्डम जैसे शहरों में घर मिलने में परेशानी जैसी दिक्कतें भी आ सकती हैं। इसके अलावा, यूरोप के कुछ देशों में बदलते राजनीतिक माहौल और माइग्रेशन को लेकर लोगों के विचारों में बदलाव भी ऐसे फैक्टर हैं जिन पर छात्रों को नज़र रखनी होगी।
