मध्य पूर्व (GCC) देशों में मौजूद अपनी सहायक कंपनियों को भारतीय कंपनियों से मिलने वाले वित्तीय समर्थन में भारी बढ़ोतरी हुई है। मार्च से मई 2026 के बीच यह राशि **51%** बढ़कर **$1.9 अरब** (लगभग ₹15,000 करोड़) तक पहुंच गई है। यह पैसा मुख्य रूप से लोन और गारंटी के रूप में भेजा जा रहा है, ताकि UAE, ओमान और सऊदी अरब जैसे देशों में चल रहे कारोबार को क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनावों के बीच स्थिर रखा जा सके।
इक्विटी नहीं, लोन और गारंटी पर जोर
यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह पैसा नए प्रोजेक्ट या इक्विटी विस्तार के लिए नहीं भेजा जा रहा है। बल्कि, मौजूदा व्यावसायिक इकाइयों को सहारा देने के लिए लोन और वित्तीय गारंटी के रूप में इसका भारी इस्तेमाल हो रहा है।
- UAE: कुल GCC निवेश का $1.6 अरब UAE को मिला, जिसमें 57% गारंटी और 26% लोन के रूप में थे। केवल 17% ही नई इक्विटी थी।
- ओमान: यहां निवेश में लगभग 69% लोन शामिल थे।
- सऊदी अरब: यहां 84% निवेश गारंटी के रूप में था।
क्यों हो रही है ये कवायद?
वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि यह एक बचाव रणनीति है। अमेरिका-ईरान संघर्ष के बढ़ने के बाद पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच, कंपनियां अपनी विदेशी इकाइयों में लिक्विडिटी (नकदी) बनाए रखने और परिचालन स्थिरता सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही हैं।
बड़ी कंपनियों पर असर
कई बड़ी भारतीय कंपनियों ने इस रणनीति का सहारा लिया है:
- Reliance Industries: अपनी UAE इकाई के लिए $250 मिलियन की गारंटी जारी की।
- Lloyds Metals and Energies: सहायक कंपनी को लोन और गारंटी के जरिए $210 मिलियन दिए।
- MAN Industries: सऊदी अरब में अपने स्टील कारोबार के लिए $140 मिलियन की गारंटी दी।
- Acme Global Green Hydrogen: ओमान में अपनी प्रोजेक्ट इकाई को $28 मिलियन का लोन दिया।
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि कुछ बड़ी कंपनियाँ ही इस विदेशी निवेश की अगुवाई कर रही हैं। हालाँकि ये कदम सहायक कंपनियों के वित्तीय संकट के जोखिम को कम करते हैं, लेकिन इससे मूल भारतीय कंपनियों की बैलेंस शीट पर आकस्मिक देनदारियाँ (Contingent Liabilities) भी बढ़ जाती हैं। अगर क्षेत्रीय संघर्ष के कारण इन सहायक कंपनियों को लंबे समय तक परिचालन संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ता है, तो मूल कंपनियों को इन गारंटियों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त नकदी आवंटित करनी पड़ सकती है।
