अमेरिकी व्यापार नीति (US Trade Policy) में हुए अहम बदलावों का असर अब भारतीय एक्सपोर्टर्स (Indian Exporters) पर दिखने लगा है। हालांकि, यह तस्वीर मिली-जुली है। एक ओर जहां अमेरिकी बायरों (US Buyers) की पूछताछ में बढ़ोतरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर एक नई 10% इंपोर्ट सरचार्ज (Import Surcharge) और नीतिगत अनिश्चितता (Policy Volatility) चिंता का विषय बनी हुई है।
टैरिफ में राहत और नई सरचार्ज की चिंता
यह सब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 20 फरवरी, 2026 के एक अहम फैसले के बाद शुरू हुआ। इस फैसले ने प्रशासन द्वारा लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ (Reciprocal Tariffs) को रद्द कर दिया, जो कि भारतीय सामानों पर 50% तक जा पहुंचे थे। एक अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Deal) के तहत इन ड्यूटीज (Duties) को काफी कम कर दिया गया, जिससे भारतीय निर्यातकों (Exporters) को तुरंत राहत मिली। हालांकि, राहत के साथ ही एक नई चुनौती भी आ गई है। 24 फरवरी, 2026 से 10% का एक नया ग्लोबल इंपोर्ट सरचार्ज (Global Import Surcharge) लागू हो गया है, जो भविष्य में बढ़कर 15% तक जा सकता है। यह सरचार्ज 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत लगाया गया है और फिलहाल 150 दिनों के लिए अस्थायी है, जब तक कि कांग्रेस इसे बढ़ाए नहीं। यह नई लागत और अनिश्चितता पैदा कर रहा है।
एक्सपोर्ट परफॉर्मेंस में सुधार, पर अनिश्चितता का साया
पिछले जनवरी 2026 में, भारतीय मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स (Merchandise Exports) अमेरिका के लिए 21.77% घटकर $6.6 बिलियन रह गए थे, जो पिछले मार्च 2025 के रिकॉर्ड $11.2 बिलियन से काफी कम था। इन ऊंची टैरिफ्स का सीधा असर था। लेकिन अब, जैसे ही टैरिफ में कमी आई है, खरीदारों (Buyers) से पूछताछ बढ़ी है। निर्यातकों को उम्मीद है कि आने वाले त्योहारी सीजन (Fall season) में ऑर्डर फिर से जोर पकड़ेंगे। हालांकि, अमेरिकी व्यापार नीति में तेजी से हो रहे बदलावों ने एक ऐसी स्थिति बना दी है जहाँ स्थिरता (Predictability) बहुत कम है, और यह एक्सपोर्टर्स के लिए योजना बनाना मुश्किल बना रहा है।
बढ़ती प्रतिस्पर्धा
भारतीय निर्यातकों को अब वियतनाम (Vietnam) जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। 2025 में, वियतनाम अमेरिका का सबसे बड़ा गारमेंट एक्सपोर्टर (Apparel Exporter) बनकर उभरा है, जिसने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। ऐसा बेहतर प्रोडक्ट मिक्स (Product Mix) और बायरों के साथ मजबूत जुड़ाव के कारण हुआ है। जबकि बांग्लादेश (Bangladesh) ने भी अमेरिका में अपने एक्सपोर्ट्स में ग्रोथ देखी है, वियतनाम का बड़ा एक्सपोर्ट वैल्यू इस अंतर को साफ दिखाता है। दूसरी ओर, भारत के टेक्सटाइल और अपैरल एक्सपोर्ट्स (Textile and Apparel Exports) में नवंबर 2025 में 31.4% की गिरावट देखी गई, जबकि वियतनाम ने 12.2% की बढ़ोतरी दर्ज की। इससे पता चलता है कि खरीदार उन मार्केट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं जहाँ व्यापार की पहुंच स्थिर हो और लागत का अनुमान लगाया जा सके।
ऐतिहासिक संदर्भ और मैक्रो हेडविंड्स
अमेरिकी व्यापार नीति की अस्थिरता कोई नई बात नहीं है। अगस्त-सितंबर 2025 में लगाए गए 50% के टैरिफ के कारण ऑर्डर रद्द हो गए थे और एक्सपोर्ट्स में बड़ी गिरावट आई थी। उस समय, निर्यातकों ने डिस्काउंट (Discounts) देकर कुछ हद तक इस झटके को झेल लिया था, लेकिन मौजूदा नीतिगत अनिश्चितता (Policy Flux) बताती है कि ऐसी मुश्किल बातचीत फिर से हो सकती है। अमेरिका के आर्थिक माहौल में, जैसे कि बड़ा ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और नीतिगत अनिश्चितता के कारण डॉलर में संभावित कमजोरी (Dollar Weakness), इस स्थिति को और जटिल बना रही है।
संरचनात्मक कमजोरियां और सेक्टरल रिस्क
टेक्सटाइल, अपैरल, लेदर और फुटवियर जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स (Labour-intensive Sectors) इस अस्थिरता के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। ये सेक्टर्स लाखों लोगों को रोजगार देते हैं और 50% टैरिफ से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए थे। वर्तमान में ड्यूटी में कमी से राहत मिली है, लेकिन भारतीय निर्माताओं को अभी भी कुछ क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में उच्च टैरिफ का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, 50% टैरिफ अवधि के दौरान, भारतीय लेदर और फुटवियर एक्सपोर्ट्स कंबोडिया, इटली और वियतनाम जैसे देशों की तुलना में नुकसान में थे, जहाँ टैरिफ कम थे। अमेरिकी प्रशासन द्वारा धारा 301 के तहत टैरिफ लगाने का खतरा अभी भी एक बड़ी चिंता बना हुआ है।
भविष्य का दृष्टिकोण
उद्योग विशेषज्ञ FY27 तक भारत के टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर के लिए दोहरे अंकों की निर्यात वृद्धि (Double-digit Export Growth) की उम्मीद कर रहे हैं, बशर्ते नए व्यापार समझौते स्थिर रहें। हालांकि, प्रशासन के नीतिगत बदलावों के इतिहास को देखते हुए यह आशावाद कुछ हद तक संतुलित है। वर्तमान 10% सरचार्ज अस्थायी है, और भविष्य की कार्रवाइयां राजनीतिक विवेक पर निर्भर करेंगी। यह निर्यातकों के लिए दीर्घकालिक योजना (Long-term Planning) को एक बड़ी चुनौती बनाता है जो अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं।