टैरिफ में बड़ी कटौती, पर लागू होने पर सवाल
अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड रिश्तों में नरमी के संकेत मिले हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि वे भारत से आयात होने वाले सामानों पर लगने वाले टैरिफ (Tariff) को मौजूदा 50% से घटाकर 18% करेंगे। इस घोषणा का भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा मतलब है, क्योंकि इससे उनके उत्पाद अमेरिकी मार्केट में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे। मौजूदा समय में, भारत के प्रतिस्पर्धी जैसे बांग्लादेश, वियतनाम, श्रीलंका और पाकिस्तान 19% से 20% का टैरिफ झेलते हैं, जबकि चीन पर 34% से 37% का टैरिफ लगता है। अगर यह 18% का दर लागू होता है, तो भारतीय उत्पाद इन देशों से बेहतर स्थिति में आ जाएंगे।
लेकिन, इस बड़ी घोषणा के बावजूद, असली तस्वीर अभी साफ नहीं है। भारतीय पक्ष की ओर से साफ कहा गया है कि किसी भी समझौते की बारीकियां और उसके लागू होने का सटीक समय-सीमा अभी तय होनी बाकी है। यानी, यह अभी भी एक प्रस्तावित दर है और औपचारिक समझौते के बिना इसका लाभ व्यवसायों को नहीं मिल पाएगा।
बड़े मुद्दों पर मतभेद
इस "समझौते" को लेकर कई स्तरों पर विरोधाभासी बयान सामने आए हैं, जिससे अनिश्चितता और बढ़ गई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलने पर सहमति जताई है। वहीं, दूसरी ओर, भारतीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि कृषि और डेयरी क्षेत्र सुरक्षित रहेंगे। व्हाइट हाउस ने ट्रंप के दावे को दोहराते हुए अमेरिकी कृषि निर्यात के लिए बेहतर पहुंच की बात कही है, जिससे इस मुद्दे पर स्पष्टता की सख्त जरूरत है।
मामले को और जटिल बनाते हुए, ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई है। हालांकि, जमीनी हकीकत इससे थोड़ी अलग दिखती है। भारत रूस से तेल आयात कर रहा है, हालांकि यह धीरे-धीरे कम हो रहा है, और सूत्रों का कहना है कि गैर-प्रतिबंधित कंपनियों से खरीद जारी रहेगी। ऐसे में, भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े रणनीतिक फैसलों पर उसकी स्वायत्तता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
इसके अलावा, भारत ने अमेरिका से $500 बिलियन के सामान खरीदने के ट्रंप के दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। भारतीय सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह खरीद संभवतः पांच साल की अवधि में हो सकती है, जबकि भारत का अमेरिका से कुल आयात वर्तमान में लगभग $45 बिलियन है। इन दावों, प्रति-दावों और अफवाहों को सुलझाने के लिए एक औपचारिक समझौते की बेहद आवश्यकता है।
बाजार पर अनिश्चितता का साया
फिलहाल, यह पूरी स्थिति व्यवसायों के लिए एक "वेट एंड वॉच" (Wait and Watch) मोड लेकर आई है। कॉन्ट्रैक्ट तय करने, प्राइसिंग (Pricing) और सप्लाई चेन (Supply Chain) प्रबंधन पर निर्भर कंपनियां अभी निर्णय लेने से कतरा रही हैं। ऐतिहासिक रूप से, जब ट्रेड डील की घोषणाएं बिना ठोस कार्यान्वयन विवरण के होती हैं, तो बाजार में अस्थिरता देखी जाती है। विश्लेषकों (Analysts) का भी मानना है कि जब तक कोई औपचारिक संधि पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक आईटी सर्विसेज, फार्मा और टेक्सटाइल जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर के लिए टारगेट प्राइस (Target Price) में तुरंत बदलाव करना जल्दबाजी होगी। यह अनिश्चितता तब तक बनी रहेगी जब तक इन सभी सवालों के जवाब एक हस्ताक्षरित समझौते के माध्यम से नहीं मिल जाते।
