टैरिफ में बड़ी कटौती और भारतीय निर्यातकों के लिए मौके
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है, जिसके तहत एक नई ट्रेड डील की घोषणा की गई है। इस समझौते के तहत, अमेरिका भारत से आयात होने वाले अधिकांश सामानों पर लगने वाले टैरिफ को 50% के ऊंचे स्तर से घटाकर सिर्फ 18% कर देगा। इस खबर से उत्साहित होकर, 3 फरवरी 2026 को भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक Sensex और Nifty में लगभग 3% की तेजी देखी गई। इस कदम से भारत के लेबर-इंटेंसिव एक्सपोर्ट सेक्टर्स, जैसे कि टेक्सटाइल, लेदर, सी-फूड और स्पेशियलिटी केमिकल्स, को अमेरिकी बाजार में अपनी पैठ जमाने का बड़ा मौका मिलेगा।
भारत की ओर से भी अमेरिका से आने वाले सामानों पर टैरिफ कम करने की प्रतिबद्धता जताई गई है। भारत का लक्ष्य लगभग 98-99% औद्योगिक उत्पादों पर टैरिफ को मौजूदा 13.5% के औसत से घटाकर शून्य करना है। इसमें कुछ खास तरह के एग्रीकल्चरल गुड्स और इंडस्ट्रियल कंपोनेंट्स भी शामिल हैं।
अमेरिकी कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने की कोशिशें vs भारतीय किसानों की चिंता
हालांकि, इस डील में एक बड़ा टकराव भी सामने आया है। अमेरिकी अधिकारी, खासकर एग्रीकल्चर सेक्रेटरी, भारत को अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए एक बड़े बाजार के तौर पर विकसित करने पर जोर दे रहे हैं। उनका कहना है कि 2024 में भारत के साथ अमेरिका का एग्रीकल्चर ट्रेड डेफिसिट (कृषि व्यापार घाटा) 1.3 अरब डॉलर था, जिसे वे कम करना चाहते हैं। US ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव ने तो नट्स, वाइन, फल और सब्जियों जैसे कई अमेरिकी एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स पर टैरिफ को शून्य करने का संकेत भी दिया है।
इसके बिल्कुल विपरीत, भारत के यूनियन कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने संवेदनशील कृषि और डेयरी क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखेगा। यह सेक्टर करोड़ों भारतीयों की आजीविका से जुड़ा है, और इसे किसी भी बड़ी टैरिफ रियायत (concession) के दायरे से बाहर रखा जाएगा। भारतीय किसानों के संगठन और विपक्षी दल इस बात से चिंतित हैं कि अमेरिका से आने वाले भारी सब्सिडी वाले कृषि उत्पाद, जो अक्सर बहुत सस्ते होते हैं, घरेलू किसानों के लिए बड़ी मुसीबत पैदा कर सकते हैं।
ट्रेड इम्बैलेंस और आगे की अनिश्चितता
यह डील ऐसे समय पर आई है जब कुछ समय पहले (अगस्त 2025) अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगा दिया था। 2024 में भारत के साथ अमेरिका का कुल ट्रेड डेफिसिट लगभग 45.7 अरब डॉलर था, जिसे इस डील से पाटने की कोशिश की जा रही है।
फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि कृषि क्षेत्र को लेकर अंतिम समझौता क्या होगा। अमेरिकी अधिकारियों के वादे और भारतीय मंत्री के आश्वासन के बीच की खाई को पाटना बाकी है। जब तक डील के लिखित और बारीक विवरण सामने नहीं आते, और यह साफ नहीं होता कि भारत अपने संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा कैसे करेगा, तब तक बाजार में अनिश्चितता बनी रह सकती है।
