India-US Trade Deal: अमेरिका को फायदा, भारत पर रियायतों का बोझ? सामने आए सवाल

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India-US Trade Deal: अमेरिका को फायदा, भारत पर रियायतों का बोझ? सामने आए सवाल
Overview

भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौता अंतिम रूप ले चुका है, लेकिन ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की शुरुआती रिपोर्ट ने इस डील में भारत की ओर से बड़ी रियायतों की ओर इशारा किया है। GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने भारत द्वारा अगले पांच वर्षों में **$500 अरब** अमेरिकी सामान खरीदने के वादे की व्यवहार्यता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

क्या है यह नया ट्रेड एग्रीमेंट?

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के शुरुआती विश्लेषण से पता चलता है कि भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए अंतरिम व्यापार समझौते में रियायतों का संतुलन एकतरफा है, जिसका बड़ा फायदा अमेरिका को हुआ है। इस समझौते का उद्देश्य मौजूदा टैरिफ को कम करना है, लेकिन GTRI का मानना है कि इससे भारत की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिति और भू-राजनीतिक स्थिति पर असर पड़ सकता है।

भारत की ओर से बड़ी छूटें

GTRI की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने भारत से अपने पुराने टैरिफ को कम करने के बदले में भारत के बाजार में स्थायी और व्यापक पहुंच हासिल कर ली है। जहां अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ को पहले के 50% से घटाकर 18% करने पर सहमति जताई है, वहीं भारत ने अमेरिका के कई औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर टैरिफ को खत्म या कम करने का वादा किया है। इसमें सूखे दारिडेर्स ग्रेन्स, रेड सोरघम, ट्री नट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट जैसे उत्पाद शामिल हैं। इसके अलावा, समझौते में गैर-टैरिफ और रणनीतिक रियायतें भी शामिल हैं, जो भारत की तीसरे देशों के साथ व्यापार करने की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती हैं और उसे अमेरिकी भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं से बांध सकती हैं, जिससे BRICS देशों के साथ भारत के संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं।

$500 अरब के खरीद वादे पर संदेह

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने भारत के उस वादे पर खास तौर पर चिंता जताई है, जिसके तहत भारत अगले पांच सालों में $500 अरब मूल्य का अमेरिकी सामान खरीदेगा। यह राशि भारत के वर्तमान वार्षिक आयात ($50 अरब से कम) से बारह गुना से भी अधिक है, जिसे श्रीवास्तव अव्यावहारिक मानते हैं। उन्होंने बताया कि इस वादे के बड़े हिस्से, जैसे विमानों की खरीद, विशुद्ध रूप से निजी क्षेत्र के निर्णय होते हैं, न कि सरकारी आदेश। उदाहरण के लिए, यदि भारत अगले पांच वर्षों में अपना बोइंग बेड़ा दोगुना भी कर लेता है, तो भी यह अनुमानित $60 अरब होगा, जो वादे की कुल राशि से बहुत कम है। इससे यह संकेत मिलता है कि यह वादा निकट अवधि की बाध्यकारी प्रतिबद्धता से अधिक एक दीर्घकालिक लक्ष्य है।

घरेलू उद्योगों पर असर की आशंका

अमेरिका के कुछ खास कृषि उत्पादों, जैसे सेब और संतरे पर टैरिफ कम होने से भारतीय किसानों की ओर से कड़ा विरोध होने की आशंका है। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, स्मार्टफोन और सोलर पैनल पर टैरिफ कम होने या खत्म होने से भारत के घरेलू विनिर्माण क्षेत्र के भविष्य के विकास और प्रतिस्पर्धात्मकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि समझौते का लक्ष्य द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देना है, लेकिन इन प्रमुख घरेलू क्षेत्रों पर इसके विशिष्ट प्रभाव पर बारीकी से नजर रखने की आवश्यकता होगी।

आगे क्या? विश्लेषकों की राय

कुल मिलाकर, विश्लेषकों का मानना है कि टैरिफ में कटौती भारतीय निर्यातकों, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण जैसे क्षेत्रों के लिए एक सकारात्मक कदम है, जहां भारत 'चाइना+1' विकल्प के रूप में उभर रहा है। यह समझौता टैरिफ कटौती के माध्यम से लगभग 0.2% सालाना के वृद्धिशील जीडीपी (GDP) बूस्ट में योगदान कर सकता है। हालांकि, $500 अरब के खरीद वादे की अनिश्चित प्रकृति और भू-राजनीतिक तनाव की संभावना को लेकर समग्र भावना संयमित है। कुछ लोगों को उम्मीद है कि नए नियमों के कारण निर्यात बुकिंग में तेजी से सुधार होगा, लेकिन बड़े प्रतिबद्धताओं के लिए ठोस समय-सीमा और औपचारिक दस्तावेजों की अनुपस्थिति बाजार को संभावित निराशा के प्रति खुला छोड़ देती है। अब फोकस कार्यान्वयन विवरणों और भारत द्वारा अमेरिका के साथ अपनी प्रतिबद्धताओं को अपने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संबंधों और घरेलू आर्थिक अनिवार्यता के साथ संतुलित करने की सीमा पर रहेगा।

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