15 जुलाई से भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच एक बड़ा ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) लागू होने वाला है। इसके तहत, भारत से होने वाले 99% एक्सपोर्ट्स पर UK में कोई ड्यूटी नहीं लगेगी। इस डील से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार **2030** तक दोगुना होकर **$112 बिलियन** तक पहुँचने की उम्मीद है। यह टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और केमिकल जैसे सेक्टर्स के लिए बड़ा मौका है, साथ ही टेक्नोलॉजी में भी सहयोग बढ़ेगा।
नई राहें खुलेंगी भारतीय एक्सपोर्ट के लिए
भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई से लागू हो रहा है। यह दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों के लिए एक नया ढाँचा तैयार करेगा। इस समझौते का मुख्य मकसद दोनों देशों के बीच मौजूदा $56 बिलियन के व्यापार को 2030 तक बढ़ाकर $112 बिलियन करना है।
भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए बड़ा बूस्ट
इस समझौते का सबसे अहम पहलू यह है कि भारत से भेजे जाने वाले 99% सामानों पर यूनाइटेड किंगडम में कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी। इससे भारतीय प्रोडक्ट्स की कीमतें प्रतिस्पर्धी बनेंगी और लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज जैसे टेक्सटाइल, कपड़े, चमड़ा, फुटवियर, रत्न और आभूषण, इंजीनियरिंग गुड्स और केमिकल्स को बड़ा फायदा होगा। यह छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) के लिए अपने ग्लोबल फुटप्रिंट बढ़ाने का बेहतरीन मौका है।
इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी में बढ़ेगा सहयोग
सिर्फ ड्यूटी कम करने से आगे बढ़कर, CETA औद्योगिक और तकनीकी सहयोग पर भी ज़ोर देगा। यह समझौता भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और स्किल्ड वर्कफोर्स को यूके की प्रेसिजन इंजीनियरिंग, एडवांस्ड मैटेरियल्स और ऑटोमेशन की विशेषज्ञता से जोड़ेगा। इससे इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सप्लाई चेन, रोबोटिक्स और एयरोस्पेस कंपोनेंट्स जैसे क्षेत्रों में नए बिजनेस अवसर पैदा हो सकते हैं।
टेक्नोलॉजी सेक्टर में सहयोग भी इस डील का एक अहम हिस्सा है। भारत की सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की ताकत, यूके की AI, सेमीकंडक्टर और नई तकनीकों में रिसर्च के साथ मिलकर काम करेगी। इससे भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के विकास को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि यूके की कंपनियां यहां अपनी हाई-वैल्यू ऑपरेशंस बढ़ाना चाहेंगी। इसके अलावा, यह डील हेल्थकेयर और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सेक्टर्स को भी कवर करती है, जहाँ भारतीय फार्मा मैन्युफैक्चरिंग और यूके की बायोटेक्नोलॉजी और ग्रीन फाइनेंस सेक्टर मिलकर काम कर सकते हैं।
आगे की राह
हालांकि, ट्रेड बैरियर कम होने से एक्सपोर्टर्स को सीधा फायदा होगा, लेकिन असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां यूके मार्केट के नए रेगुलेटरी और क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को कितनी जल्दी अपना पाती हैं। इन्वेस्टर्स आने वाली तिमाहियों में टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग कंपनियों के एक्सपोर्ट प्रदर्शन पर नज़र रख सकते हैं कि क्या ड्यूटी-फ्री फायदे से वॉल्यूम ग्रोथ और प्रॉफिट मार्जिन में सुधार होता है। जैसे-जैसे यह पार्टनरशिप आगे बढ़ेगी, पॉलिसी के कार्यान्वयन में निरंतरता और संयुक्त तकनीकी परियोजनाओं की प्रगति लंबे समय में सेक्टर के विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी।
