India-UK Trade Deal: निवेशकों के लिए क्या है खास, 15 जुलाई से लागू

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India-UK Trade Deal: निवेशकों के लिए क्या है खास, 15 जुलाई से लागू

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भारत और यूके 15 जुलाई से अपना बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) लागू करने जा रहे हैं। इस डील से कपड़ा, लेदर और चाय जैसे भारतीय एक्सपोर्ट्स पर ड्यूटी खत्म होगी, वहीं यूके के इम्पोर्ट पर टैक्स कम होंगे। इससे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स को फायदा होगा, लेकिन ऑटोमोबाइल और प्रीमियम स्पिरिट्स जैसे घरेलू उद्योगों को नई प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।

क्या हुआ है?

भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) ने ऐलान किया है कि उनका फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) 15 जुलाई से लागू हो जाएगा। पिछले साल साइन हुई यह बड़ी डील दोनों देशों के बीच ट्रेड बैरियर्स को काफी कम करने के लिए बनाई गई है। इस एग्रीमेंट के तहत दोनों देशों के बीच आने-जाने वाले गुड्स पर इम्पोर्ट टैक्स को खत्म या कम किया जाएगा, जिसका लक्ष्य $112 बिलियन तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करना है।

एक्सपोर्ट के मौके

भारतीय कंपनियों के लिए सबसे बड़ा फायदा कई लेबर-इंटेंसिव एक्सपोर्ट्स पर ड्यूटी का खत्म होना है। टेक्सटाइल और अपैरल पर पहले 12% तक की टैरिफ अब शून्य हो जाएगी। इसी तरह, लेदर प्रोडक्ट्स पर 16% तक की इम्पोर्ट ड्यूटी खत्म होगी। इसके अलावा मरीन प्रोडक्ट्स, केमिकल्स, बेस मेटल्स और चाय, कॉफी, मसालों जैसे एग्री गुड्स को भी ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा। इन बदलावों से भारतीय प्रोडक्ट्स यूके मार्केट में ज़्यादा कॉम्पिटिटिव बनेंगे और एक्सपोर्टर्स को मार्केट शेयर बढ़ाने में मदद मिलेगी।

इम्पोर्ट से प्रतिस्पर्धा

निवेशकों को ट्रेड डील के दूसरे पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए। भारत यूके के प्रोडक्ट्स पर एवरेज टैरिफ को 15% से घटाकर 3% कर देगा। इससे कुछ सेक्टर्स में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। उदाहरण के लिए, स्कॉच व्हिस्की पर 150% की ड्यूटी घटकर तुरंत 75% हो जाएगी, और आने वाले एक दशक में यह और कम होगी। इससे भारतीय स्पिरिट्स कंपनियों के डोमेस्टिक मार्केट शेयर पर असर पड़ सकता है। ऑटोमोबाइल पर 110% की टैरिफ भी कोटा सिस्टम के तहत धीरे-धीरे 10% तक आ जाएगी, जो डोमेस्टिक व्हीकल मैन्युफैक्चरर्स के लिए कॉम्पिटिशन का माहौल बदल सकती है।

IT और सर्विसेस का एंगल

गुड्स ट्रेड के अलावा, इस एग्रीमेंट में एक सोशल सिक्योरिटी अरेंजमेंट भी शामिल है। यह यूके के नागरिकों को भारत में काम करते हुए अपनी यूके स्टेट पेंशन बनाना जारी रखने की सुविधा देता है, बिना भारतीय सोशल सिक्योरिटी सिस्टम में एक साथ भुगतान किए। भारतीय IT और प्रोफेशनल सर्विसेस सेक्टर के लिए यह एक पॉजिटिव डेवलपमेंट है, क्योंकि यह दोनों देशों के बीच स्किल्ड टैलेंट के मूवमेंट से जुड़े कंप्लायंस बर्डन और कॉस्ट को सरल बनाता है।

निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?

आगे चलकर, निवेशकों को यह देखना चाहिए कि इन बदलावों का अलग-अलग इंडस्ट्रीज के प्रॉफिट मार्जिन और मार्केट पोजीशनिंग पर क्या असर पड़ता है। टेक्सटाइल और लेदर जैसी एक्सपोर्ट-हैवी कंपनियों के लिए, वॉल्यूम ग्रोथ और यूके में मार्केट शेयर कैप्चर करने की क्षमता पर नजर रखनी होगी। वहीं, प्रीमियम स्पिरिट्स और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टर्स, जिन्हें इम्पोर्ट से बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा, उन्हें अपने मार्केट शेयर और मार्जिन को बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा। भले ही यह डील व्यापक हो, असली फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां नई टैरिफ व्यवस्था के अनुसार अपनी सप्लाई चेन और प्राइसिंग स्ट्रेटेजी को कितनी जल्दी अडॉप्ट कर पाती हैं।

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Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.