India-UK Trade Deal: डिजिटल सेवाओं को मिलेगी नई उड़ान, पेपरलेस ट्रांजैक्शन होंगे आसान

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India-UK Trade Deal: डिजिटल सेवाओं को मिलेगी नई उड़ान, पेपरलेस ट्रांजैक्शन होंगे आसान

भारत और यूके के बीच ऐतिहासिक कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) लागू हो गया है। इस नए समझौते का मकसद डिजिटल ट्रेड को बढ़ावा देना और दोनों देशों के बीच पेपरलेस ट्रांजैक्शन को आसान बनाना है। यह भारत के लिए खास है, जो डिजिटल सेवाओं का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक है, क्योंकि इससे ट्रांजैक्शन कॉस्ट कम होगी और इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को कानूनी मान्यता मिलेगी।

डिजिटल एक्सपोर्ट्स में भारत की मजबूत पकड़

भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच हाल ही में साइन हुए कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) में डिजिटल ट्रेड के लिए एक खास चैप्टर जोड़ा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच इलेक्ट्रॉनिक रूप से सेवाओं के आदान-प्रदान को सरल बनाना है। भारत और यूके दोनों ही 'डिजिटली डिलीवर्ड सर्विसेज' (DDS) के बड़े निर्यातक हैं, जिसमें सॉफ्टवेयर सेवाएं, कंसल्टिंग और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग जैसी सेवाएं शामिल हैं। यह समझौता दोनों देशों के व्यवसायों के लिए एक स्थिर और अनुमानित माहौल बनाने पर केंद्रित है।

वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2025 में $328 बिलियन की DDS एक्सपोर्ट की, जिससे यह इस क्षेत्र में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक बना रहा। CETA में डिजिटल ट्रेड का एक समर्पित चैप्टर शामिल होने से इस एक्सपोर्ट बेस को सुरक्षित रखने और भविष्य में इसे और बढ़ाने में मदद मिलेगी। डेटा शेयरिंग और कंज्यूमर प्रोटेक्शन के लिए स्पष्ट नियम बनाकर, यह समझौता भारतीय आईटी और सर्विस कंपनियों को एक ऐसे ग्लोबल परिदृश्य में स्थिरता प्रदान करेगा जहां संरक्षणवादी व्यापार नीतियां बढ़ रही हैं।

पेपरलेस ट्रेड से बढ़ेगी रफ्तार

इस समझौते का एक अहम हिस्सा पेपरलेस ट्रेड को बढ़ावा देना है, ताकि क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजैक्शन में लगने वाले समय और खर्च को कम किया जा सके। दोनों देश अब इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (Electronic Signatures) और इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणीकरण (Electronic Authentication) का समर्थन करने वाले कानूनी ढांचे अपनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इन तकनीकों को आपसी मान्यता देकर, यह डील अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य को धीमा करने वाली प्रशासनिक बाधाओं को कम करने का इरादा रखती है। जहां भारत ने 2025 तक अपने घरेलू पेपरलेस ट्रेड उपायों को 100% लागू कर लिया है, वहीं क्रॉस-बॉर्डर कार्यान्वयन में 2021 से लगभग 67% की प्रगति हुई है। CETA फ्रेमवर्क इस अंतर को पाटने में उत्प्रेरक का काम करने की उम्मीद है।

आगे की राह और संभावित चुनौतियां

व्यापार दक्षता के सकारात्मक दृष्टिकोण के बावजूद, निवेशक और बाजार विश्लेषक समझौते की कुछ सीमाओं पर नज़र रख सकते हैं। विशेष रूप से, CETA इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी के लिए स्थायी रोक (moratorium) का स्पष्ट रूप से वादा नहीं करता है - जो कि यूके के ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार सौदों में शामिल एक शर्त है। जैसे-जैसे वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के ई-कॉमर्स पर काम को लेकर वैश्विक चर्चाएं अनिश्चितता का सामना कर रही हैं, ऐसे में द्विपक्षीय स्तर पर इस जीरो-ड्यूटी प्रतिबद्धता की अनुपस्थिति भारतीय व्यापार अधिकारियों के लिए भविष्य के समझौतों में बातचीत का एक बिंदु बन सकती है।

भारतीय व्यवसायों को इसका अंतिम लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि नई दिल्ली इन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप घरेलू कानूनी सुधारों को कितनी जल्दी लागू करती है और इन डिजिटल सिद्धांतों को अन्य व्यापारिक साझेदारियों तक कितनी प्रभावी ढंग से बढ़ाया जाता है। हितधारकों के लिए प्राथमिक निगरानी बिंदु इलेक्ट्रॉनिक इनवॉइसिंग और प्रमाणीकरण के क्रॉस-बॉर्डर कार्यान्वयन की गति होगी, जो सीधे भारतीय सेवा निर्यातकों की परिचालन लागत और दक्षता को प्रभावित करता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.