नए इंडिया-UK ट्रेड एग्रीमेंट के तहत, भारत के फार्मा एक्सपोर्ट्स 2026-27 तक **$981.16 मिलियन** तक पहुंचने का अनुमान है। इस डील से जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ खत्म हो जाएगा, जिससे भारतीय कंपनियों की कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ेगी और सप्लाई चेन मजबूत होगी।
भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच नए कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) के लागू होने के बाद, भारतीय फार्मा एक्सपोर्ट्स में अच्छी खासी बढ़ोतरी की उम्मीद है। फार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (Pharmexcil) के अनुमानों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026-27 तक एक्सपोर्ट्स 8.66% बढ़कर $981.16 मिलियन तक पहुंच सकते हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा $902.96 मिलियन था।
जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ हटने का असर
इस ट्रेड एग्रीमेंट के तहत कई सामानों पर टैरिफ हटा दिया गया है, जिसमें फार्मास्यूटिकल्स भी शामिल हैं। भारतीय कंपनियों के लिए, इन व्यापार बाधाओं को दूर करने से ब्रिटिश मार्केट में अन्य अंतर्राष्ट्रीय सप्लायर्स के मुकाबले जेनेरिक दवाएं ज्यादा किफायती बनेंगी। लागत में कमी से एक्सपोर्टर्स के मार्जिन में सुधार होने की उम्मीद है, जिन्हें पहले टैरिफ स्ट्रक्चर के बोझ का सामना करना पड़ता था। चूंकि मौजूदा एक्सपोर्ट्स का 89.54% हिस्सा ड्रग फॉर्मूलेशन और बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स का है, इसलिए फिनिश्ड डोज फॉर्म्स में मजबूत पोर्टफोलियो वाली कंपनियां इस बेहतर पहुंच का सबसे ज्यादा फायदा उठा सकती हैं।
UK मार्केट का रणनीतिक महत्व
यूनाइटेड किंगडम यूरोप में भारत का सबसे बड़ा फार्मा एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन और दुनिया भर में तीसरा सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है। यह एग्रीमेंट रेगुलेटरी कोऑपरेशन को भी बेहतर बनाने का इरादा रखता है, जो ऐतिहासिक रूप से यूरोपीय स्वास्थ्य नियामकों द्वारा आवश्यक कड़े गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में भारतीय फर्मों के लिए एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। फिनिश्ड फॉर्मूलेशन के अलावा, पिछले वित्तीय वर्ष में एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) और बल्क ड्रग्स का एक्सपोर्ट $72.66 मिलियन रहा, जो रिटेल-रेडी दवाओं से परे व्यापक मांग को दर्शाता है।
निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें
हालांकि यह ट्रेड एग्रीमेंट विकास के लिए एक फ्रेमवर्क प्रदान करता है, लेकिन अलग-अलग कंपनियों को होने वाला वास्तविक लाभ यूके मार्केट की रेगुलेटरी आवश्यकताओं को पूरा करने और सप्लाई चेन की एफिशिएंसी बनाए रखने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगा। निवेशकों को भविष्य के एक्सपोर्ट डेटा पर नज़र रखनी चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि ग्रोथ का यह ट्रेंड जारी रहता है या नहीं, खासकर उन कंपनियों के लिए जिनका यूरोपियन मार्केट में ज्यादा एक्सपोजर है। इसके अतिरिक्त, भारतीय फर्मों और यूके-आधारित संस्थाओं के बीच मैन्युफैक्चरिंग पार्टनरशिप और रिसर्च कोलेबोरेशन पर अपडेट्स पर नजर रखने से यह जानने में मदद मिलेगी कि कंपनियां अपने रेवेन्यू स्ट्रीम को डाइवर्सिफाई करने के लिए इस ट्रेड पैक्ट का लाभ कैसे उठा रही हैं। इस ग्रोथ की स्थिरता वैश्विक कच्चे माल की कीमतों की स्थिरता और यूके की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के भीतर लागत प्रभावी जेनेरिक विकल्पों की निरंतर मांग पर भी निर्भर करेगी।
