यूके के नए स्टील टैरिफ से डील में आई रुकावट
दरअसल, जुलाई 2025 में हस्ताक्षरित हुए इंडिया-यूके कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) के ऑपरेशनल होने का इंतजार है, लेकिन यूनाइटेड किंगडम (UK) की नई स्टील इंपोर्ट (Steel Import) को लेकर आई नीतियां एक बड़ा रोड़ा बन गई हैं। ये उपाय 1 जुलाई, 2026 से लागू होने वाले हैं और टैरिफ-फ्री (Tariff-Free) स्टील इंपोर्ट को 60% तक घटा देंगे, साथ ही 50% का भारी-भरकम टैरिफ लगा देंगे। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए मुश्किल खड़ी हो गई है।
भारत के कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने साफ किया है कि डील पूरी होने वाली है, लेकिन यूके की इन नीतियों के लिए एक "अनोखे और रचनात्मक समाधान" (Unique and Creative Solution) की तलाश करनी होगी। यूके की ये नीतियां मूल बातचीत में शामिल नहीं थीं, और अब ये भारत के बड़े स्टील एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए एक चिंता का विषय बन गई हैं।
टैरिफ-फ्री स्टील कोटे में भारी कटौती
यूके सरकार ग्लोबल ओवरसप्लाई (Global Oversupply) के बीच अपने घरेलू स्टील उद्योग को बढ़ावा देना चाहती है। 1 जुलाई, 2026 से, स्टील प्रोडक्ट्स के लिए टैरिफ-फ्री इंपोर्ट कोटा मौजूदा स्तरों से करीब 60% कम हो जाएगा। इन नए कोटे से ऊपर के किसी भी स्टील इंपोर्ट पर 50% का टैरिफ लगेगा, जो कि पहले 25% था। यह नया नियम यूके में बनने वाले 20 तरह के स्टील प्रोडक्ट्स पर लागू होगा, जिसमें हॉट-रोल्ड शीट्स, क्वार्टो प्लेट्स और विभिन्न बार्स व सेक्शंस शामिल हैं। खास तौर पर, हॉट-रोल्ड कॉइल (HRC) के लिए कोटा 90% तक घटा दिया जाएगा। यह यूके में आने वाले स्टील के लिए एक बड़ा बदलाव है, जिसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ेगा, जिन्होंने 2025-26 फाइनेंशियल ईयर में यूके को $893.4 मिलियन का आयरन और स्टील प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट किया था।
ग्लोबल स्टील मार्केट बनाम भारत का बढ़ता सेक्टर
स्टील की सुरक्षा के लिए यूके का यह कदम अपने घरेलू सेक्टर को फिर से जीवित करने के बड़े प्रयास का हिस्सा है, जिसे राष्ट्रीय रक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह तब हो रहा है जब ग्लोबल स्टील मार्केट में 2026 में केवल 0.3% की वृद्धि का अनुमान है, वहीं EU+UK की डिमांड 1.3% बढ़ने की उम्मीद है। इसके विपरीत, भारत का स्टील मार्केट तेजी से बढ़ रहा है, जहां 2026 में डिमांड 7.4% बढ़ने का अनुमान है। यह नेशनल स्टील पॉलिसी (National Steel Policy) और स्पेशियलिटी स्टील के लिए PLI स्कीम जैसी नीतियों का नतीजा है।
भारत पहले भी ट्रेड प्रोटेक्शनिज्म (Trade Protectionism) का जवाब दे चुका है; EU स्टील टैरिफ के बाद, उसने WTO नियमों के तहत जवाबी ड्यूटी का प्रस्ताव रखा था। यह स्थिति CETA जैसे व्यापक ट्रेड लक्ष्यों और किसी देश के विशिष्ट उद्योगों को बचाने के बीच टकराव को दर्शाती है।
ट्रेड अनिश्चितता से एक्सपोर्टर्स के वैल्यूएशन्स पर रिस्क
भले ही CETA का लक्ष्य 99% भारतीय एक्सपोर्ट्स पर ड्यूटी खत्म करना है, लेकिन स्टील विवाद एक बड़ा रिस्क पेश करता है। JSW Steel और Tata Steel जैसी प्रमुख भारतीय स्टील कंपनियां फिलहाल ऊंचे वैल्यूएशन्स (High Valuations) पर ट्रेड कर रही हैं। उदाहरण के लिए, JSW Steel का P/E रेशियो लगभग 39.57 है, जो इंडस्ट्री के औसत 28.51 से काफी ऊपर है। Tata Steel का P/E लगभग 29-31 और Jindal Steel & Power का 33-49 के बीच है। ये आंकड़े बाजार के ऑप्टिमिज्म को दर्शाते हैं, जो लंबी ट्रेड डिस्प्यूट्स या बाजार पहुंच में कमी से हिल सकता है। यूके का यह कदम अन्य देशों को भी इसी तरह के संरक्षणवादी उपाय अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, जिससे ग्लोबल ट्रेड और भी खंडित हो सकता है। यह अनिश्चितता भारतीय स्टील एक्सपोर्टर्स के रेवेन्यू (Revenue) और प्रॉफिट (Profit) को प्रभावित कर सकती है, खासकर HRC जैसे प्रमुख प्रोडक्ट्स के कोटे में तेज कटौती को देखते हुए। इसके अलावा, एक "क्रिएटिव सॉल्यूशन" खोजने के लिए भारत को ट्रेड डील के अन्य हिस्सों में रियायतें देनी पड़ सकती हैं, जिससे डील के कुल लाभ कम हो सकते हैं।
इंडिया-यूके ट्रेड डील का आगे क्या?
अब आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या यूके के संरक्षणवादी लक्ष्यों और इंडिया-यूके CETA के समग्र उद्देश्यों को संरेखित करने के लिए चल रही बातचीत सफल होती है। रिपोर्टों से पता चलता है कि 14 मार्च, 2026 से पहले अनुबंधित (Contracted) सामानों के लिए, 2026 की तीसरी तिमाही में इंपोर्ट के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था (Transitional Arrangements) पर विचार किया जा रहा है। इस डील का नतीजा दिखाएगा कि CETA कितनी तेजी से अंतिम रूप ले सकती है और क्या व्यापक ट्रेड लिबरलाइजेशन (Trade Liberalization) की भावना प्रमुख सेक्टरों में विशिष्ट राष्ट्रीय संरक्षणवादी उपायों पर हावी हो सकती है।