भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) ने बड़ा ऐलान किया है! 15 जुलाई 2026 से कॉप्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) और डबल कॉन्ट्रिब्यूशन कन्वेंशन (DCC) लागू होंगे। इस ऐतिहासिक डील से भारतीय एक्सपोर्ट्स को 99% ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा और UK में काम करने वाले भारतीय पेशेवरों को सोशल सिक्योरिटी में 5 साल की छूट मिलेगी। इससे टेक्सटाइल, फार्मा और आईटी सेक्टर को खास फायदा होगा।
क्या हुआ?
भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) ने पुष्टि की है कि उनका कॉप्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) आधिकारिक तौर पर 15 जुलाई 2026 से लागू होगा। इस ट्रेड पैक्ट के साथ ही, 'एग्रीमेंट ऑन सोशल सिक्योरिटी' या डबल कॉन्ट्रिब्यूशन कन्वेंशन (DCC) भी इसी तारीख से प्रभावी हो जाएगा। दोनों सरकारों ने आवश्यक घरेलू प्रक्रियाओं और अनुसमर्थन को पूरा कर लिया है, जो लंबी बातचीत के दौर के अंत और द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में एक नए चरण का संकेत देता है।
निवेशकों के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?
CETA का लागू होना सीमा पार व्यापार के लिए एक बड़ा बदलाव है। इस समझौते के तहत, UK भारत के निर्यात की लगभग 99% लाइनों पर इंपोर्ट ड्यूटी खत्म कर देगा। यह भारतीय सामानों को UK मार्केट में अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने का मौका देगा, क्योंकि जो कंपटीटर्स पहले कम टैरिफ का फायदा उठाते थे, अब उन्हें बराबरी का मौका मिलेगा। भारतीय निवेशकों के लिए, इसका मतलब एक्सपोर्टर्स के लिए राजस्व बढ़ाने और मार्केट शेयर हासिल करने की क्षमता में वृद्धि है।
प्रमुख सेक्टर्स पर असर
इस डील से लेबर-इंटेंसिव और एक्सपोर्ट-ड्रिवन सेक्टर्स को खास बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। टेक्सटाइल और गारमेंट इंडस्ट्री इसका सबसे बड़ा लाभार्थी होगी, क्योंकि ड्यूटी हटने से भारतीय एक्सपोर्टर्स, खासकर रेडीमेड गारमेंट्स और होम टेक्सटाइल्स में, वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी मूल्य पर उत्पाद बेच सकेंगे। इसी तरह, फार्मास्यूटिकल्स और केमिकल्स सेक्टर्स, जहां भारत पहले से ही एक महत्वपूर्ण सप्लायर है, उन्हें UK मार्केट में आसान पहुंच मिलेगी। इस समझौते में भारत में कुछ UK आयात, जैसे ऑटोमोबाइल और स्कॉच व्हिस्की पर टैरिफ कम करने की प्रतिबद्धताएं भी शामिल हैं, जो घरेलू लग्जरी सेगमेंट में प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती हैं।
सर्विसेज के लिए सोशल सिक्योरिटी बूस्ट
आईटी और प्रोफेशनल सर्विसेज सेक्टर के लिए एक खास बात 'डबल कॉन्ट्रिब्यूशन कन्वेंशन' का लागू होना है। पहले, UK भेजे जाने वाले भारतीय पेशेवरों को अक्सर सोशल सिक्योरिटी कंट्रीब्यूशन को लेकर दोहरे वित्तीय बोझ का सामना करना पड़ता था। नया पैक्ट इस छूट की अवधि को तीन साल से बढ़ाकर पांच साल कर देता है। इससे UK में अपनी उपस्थिति बनाए रखने वाली भारतीय आईटी सर्विसेज कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट कम होगी, जिससे क्रॉस-बॉर्डर टैलेंट की तैनाती अधिक कुशल होगी और सर्विस एक्सपोर्ट करने वाले व्यवसायों के मार्जिन सुरक्षित होंगे।
स्टील की रुकावट का समाधान
15 जुलाई की प्रभावी तिथि से पहले, UK के स्टील टैरिफ व्यवस्था में बदलाव के बाद ट्रेड नेगोशिएशन में एक छोटी चुनौती आई थी। हालांकि, दोनों देशों ने इस मुद्दे को सफलतापूर्वक सुलझा लिया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बताया कि व्यावसायिक हितों की रक्षा करने और स्टील एक्सपोर्टर्स के लिए बाजार व्यवधान को कम करने के लिए एक समझौता हुआ, जिससे कार्यान्वयन की तारीख पटरी पर बनी रही।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आगे चलकर, निवेशक इस बात पर नज़र रख सकते हैं कि टेक्सटाइल, फार्मा और आईटी सेक्टर की कंपनियां UK में अपने ऑपरेशंस को कितनी जल्दी बढ़ा पाती हैं। आगामी तिमाही अर्निंग कॉल्स के दौरान मैनेजमेंट की टिप्पणियां, ड्यूटी-फ्री एक्सेस और DCC से प्रत्येक कंपनी को अपेक्षित विशिष्ट लाभों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन होंगी। इसके अतिरिक्त, जुलाई 2026 के बाद के महीनों में ट्रेड डेटा और सेक्टर-स्पेसिफिक एक्सपोर्ट वॉल्यूम को ट्रैक करने से कंपनी के राजस्व और लाभप्रदता पर समझौते के वास्तविक प्रभाव के शुरुआती संकेत मिलेंगे।
