भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच नए कॉप्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) के लागू होने के साथ ही, भारत ने ब्रिटेन को **$10 मिलियन** का पहला ज्वेलरी एक्सपोर्ट शिपमेंट भेजा है। इस डील से ज्वेलरी पर लगने वाली **4%** तक की इंपोर्ट ड्यूटी खत्म हो गई है, जिससे भारत का सालाना ज्वेलरी एक्सपोर्ट **$754 मिलियन (2025)** से बढ़कर **$2.5 बिलियन (2029)** तक पहुंचने की उम्मीद है।
भारत-यूके CETA का पहला असर
आज से लागू हुए इस ऐतिहासिक ट्रेड एग्रीमेंट ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में एक नया अध्याय खोला है। CETA के तहत, भारतीय ज्वेलरी पर लगने वाली 4% तक की इंपोर्ट ड्यूटी समाप्त हो गई है। इससे यूनाइटेड किंगडम के $4 बिलियन के इंपोर्ट मार्केट में भारतीय एक्सपोर्टर्स को सीधे तौर पर बड़ा कॉम्पिटिटिव एज (competitive edge) मिलेगा।
एक्सपोर्ट में बड़ी उम्मीदें
गोल्ड, डायमंड, सिल्वर और प्लैटिनम ज्वेलरी का यह $10 मिलियन का शुरुआती कंसाइनमेंट (consignment) इस ट्रेड विस्तार का पहला चरण है। जेम एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJPEC) के चेयरमैन, किरीट भंसाली ने कहा कि यह ब्रिटिश मार्केट में बड़ा हिस्सा हासिल करने की दिशा में एक अहम कदम है। अनुमान है कि अगले तीन सालों में भारत का यूके को कुल ज्वेलरी एक्सपोर्ट $754 मिलियन (2025) से बढ़कर करीब $2.5 बिलियन तक पहुंच सकता है।
अन्य सेक्टर्स को भी मिलेगा बूस्ट
ज्वेलरी के अलावा, टेक्सटाइल, अपैरल, लेदर और फुटवियर जैसे लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज (labor-intensive industries) से भी यूके के बायर्स (buyers) की इंक्वायरीज (inquiries) बढ़ रही हैं। ये सेक्टर्स भी ड्यूटी-फ्री एक्सेस (duty-free access) का फायदा उठाकर अपने एक्सपोर्ट मार्जिन और वॉल्यूम (volume) को बढ़ाने की फिराक में हैं।
ग्लोबल मार्केट और जोखिम
जहां एक तरफ यह ट्रेड डील ग्रोथ की उम्मीदें जगा रही है, वहीं एक्सपोर्टर्स को ग्लोबल डिमांड में आ रहे बदलावों पर भी नजर रखनी होगी। टेक्नोलॉजी सेक्टर में हालिया प्रदर्शन दिखाता है कि क्लाइंट्स की खर्च करने की प्राथमिकताएं कितनी तेजी से बदल सकती हैं। भारतीय एक्सपोर्टर्स को टैरिफ एडवांटेज (tariff advantage) तो मिलेगा, लेकिन उनकी लंबी अवधि की सफलता प्रोडक्ट की क्वालिटी, लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट (logistics management) और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सप्लायर्स (suppliers) से कॉम्पिटिशन पर भी निर्भर करेगी, जिन्हें यूके मार्केट में एक्सेस तो है ही।
इसके अलावा, इन सेक्टर्स की कंपनियां अक्सर हाई वर्किंग कैपिटल (high working capital) की जरूरत और कच्चे माल की कीमतों (जैसे गोल्ड और सिल्वर) में उतार-चढ़ाव से जूझती हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि ये बिजनेस नई ट्रेड फ्रेमवर्क के तहत एक्सपोर्ट बढ़ाते हुए इन लागतों को कितनी कुशलता से मैनेज करते हैं।
निवेशकों के लिए, अगली बड़ी अपडेट्स आने वाली तिमाही नतीजों में कंपनी-स्पेसिफिक एक्सपोर्ट वॉल्यूम (export volume) के खुलासे और सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले ऑफिशियल ट्रेड डेटा (trade data) से मिलेंगी। यह समझना ज़रूरी होगा कि जेम एंड ज्वेलरी, टेक्सटाइल और लेदर सेक्टर्स की कौन सी कंपनियां इस नए टैरिफ माहौल का फायदा उठाने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में हैं।
