विदेश मंत्री S Jaishankar ने हाल ही में UAE के तीन दिवसीय दौरे को पूरा किया है। भारत के निवेशकों के लिए यह रिश्ता बेहद अहम है, क्योंकि UAE न केवल भारत को एनर्जी सप्लाई करने वाला बड़ा देश है, बल्कि विदेशी निवेश और विदेशी मुद्रा (Remittances) का भी एक बड़ा जरिया है।
आर्थिक एकीकरण को नई मजबूती
भारत और UAE के बीच का रिश्ता अब भारत की विदेश आर्थिक नीति (Foreign Economic Policy) का मुख्य हिस्सा बन चुका है। दोनों देशों के बीच हुआ Comprehensive Economic Partnership Agreement (CEPA), जो मई 2022 से लागू है, ट्रेड बैरियर्स को कम करने और गैर-तेल व्यापार को बढ़ाने पर केंद्रित है। भारतीय कंपनियों के लिए यह एक बड़ा अवसर है, क्योंकि UAE मिडिल ईस्ट के बाजारों में प्रवेश करने का एक गेटवे है, जो लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ी राहत देता है।
एनर्जी और इन्वेस्टमेंट पर असर
एनर्जी सिक्योरिटी दोनों देशों के संबंधों की रीढ़ है। UAE भारत को तेल और गैस का प्रमुख सप्लायर है, और स्थिर सप्लाई लाइन भारत में महंगाई और इंपोर्ट बिल को कंट्रोल रखने में मदद करती है। वहीं, दूसरी ओर, UAE के सोवरेन वेल्थ फंड भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और शेयर बाजार में बड़े निवेशक हैं। निवेशकों के लिए इन हाई-लेवल बैठकों पर नजर रखना जरूरी है, क्योंकि इससे भविष्य में आने वाले नए निवेश और रेगुलेटरी माहौल का संकेत मिलता है।
रेमिटेंस और फॉरेक्स स्टेबिलिटी
UAE में लगभग 43 लाख भारतीय रहते हैं, जो वहां की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं। इनका भेजा हुआ पैसा (Remittances) भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को मजबूत रखने में बड़ी भूमिका निभाता है। यह रुपया की स्टेबिलिटी के लिए एक कुशन की तरह काम करता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से निपटने में मदद मिलती है।
आने वाले समय में, दोनों देशों के बीच ट्रेड टारगेट्स और नई जॉइंट प्रोजेक्ट्स पर निवेशकों की निगाहें रहेंगी, जो लंबे समय में भारत के ट्रेड बैलेंस के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।
