यह नई सब्सिडी स्कीम छोटे निर्यातकों (MSMEs) के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकती है। अक्सर देखा जाता है कि विदेशी बाजारों में अपने प्रोडक्ट्स बेचने के लिए कड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों और सर्टिफिकेशन्स को पूरा करना छोटे कारोबारियों के लिए बहुत महंगा पड़ जाता है। अब सरकार इसमें मदद करके इस राह की एक बड़ी बाधा को दूर कर रही है।
सरकार की बड़ी पहल: TRACE स्कीम
सरकार के ₹25,060 करोड़ के 'एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन' (Export Promotion Mission) के तहत, TRACE (Trade Regulations, Accreditation and Compliance Enablement) नाम की एक खास पहल शुरू की गई है। इस पहल का मकसद भारतीय MSMEs को ग्लोबल मार्केट की ज़रूरतों के हिसाब से तैयार करना है। इसके ज़रिए, योग्य खर्चों पर 75% तक की सब्सिडी मिलेगी, जिसकी अधिकतम सीमा ₹25 लाख प्रति इम्पोर्टर-एक्सपोर्टर कोड (IEC) सालाना होगी।
क्या हैं फायदे और क्यों है यह ज़रूरी?
कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यूरोप के REACH और CBAM जैसे कड़े नियमों को पूरा करने में छोटी कंपनियों को काफी मुश्किल आती है। उदाहरण के लिए, सिर्फ REACH रजिस्ट्रेशन के लिए एक केमिकल एक्सपोर्टर को ₹50-60 लाख तक खर्च करने पड़ सकते हैं। यह सब्सिडी इन नियमों के तहत आने वाली लागतों को काफी हद तक कम कर देगी, जिससे भारतीय MSMEs को नए और ज़्यादा फायदेमंद एक्सपोर्ट बाजारों तक पहुंचने में मदद मिलेगी।
FTAs का पूरा फायदा उठाने की तैयारी
यह स्कीम ऐसे समय पर आई है जब भारत ने 9 देशों के साथ नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) फाइनल किए हैं, जिनमें यूरोपियन यूनियन, यूके और न्यूजीलैंड जैसे बड़े ग्लोबल प्लेयर्स शामिल हैं। माना जा रहा है कि भारत-यूरोपियन यूनियन FTA अकेले 2 बिलियन लोगों के लिए एक बड़ा फ्री ट्रेड ज़ोन बनाएगा, जिससे भारतीय एक्सपोर्ट्स पर लगने वाली ड्यूटी में 96% तक की कमी आ सकती है।
हालांकि, टैरिफ कम होने के बावजूद, नॉन-टैरिफ बैरियर्स (NTBs) या कहें कि गैर-टैरिफ बाधाएं एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। CBAM जैसे नियम, जो स्टील जैसे कार्बन-इंटेंसिव प्रोडक्ट्स पर लागू होते हैं, भारतीय स्टील एक्सपोर्ट्स पर €65-€70 प्रति टन तक का अतिरिक्त बोझ डाल सकते हैं। और अगर डिफॉल्ट वैल्यू लागू हुई तो यह लागत €250-€300 प्रति टन तक भी जा सकती है। यह सब्सिडी इन कंप्लायंस लागतों को कम करके MSMEs को FTAs से मिलने वाले फायदों का पूरा इस्तेमाल करने में सक्षम बनाएगी।
क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि, इस सब्सिडी स्कीम की सफलता कुछ महत्वपूर्ण बातों पर निर्भर करेगी। पिछले अनुभवों से पता चलता है कि REACH जैसी जटिल प्रक्रियाओं के लिए ₹25 लाख का सालाना कैप सभी निर्यातकों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता, खासकर उन कंपनियों के लिए जिनके पास एक साथ कई प्रोडक्ट्स के लिए कंप्लायंस की ज़रूरतें हों। कई छोटी कंपनियों के लिए आज भी यह एक बड़ी रकम हो सकती है।
साथ ही, FTAs का असली फायदा उठाने के लिए भारतीय कंपनियों को न केवल यूरोपीय मानकों को पूरा करना होगा, बल्कि अपनी सप्लाई चेन को भी बेहतर बनाना होगा और विभिन्न प्रक्रियात्मक जटिलताओं से भी निपटना होगा। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत-यूरोपियन यूनियन FTA का फायदा सबको एक समान नहीं मिलेगा। जिन सेक्टर्स पर कड़े नियम लागू होते हैं, उन्हें तुरंत बड़े फायदे की उम्मीद कम है। CBAM जैसे नियम छोटी भारतीय स्टील उत्पादक कंपनियों पर बड़े खिलाड़ियों की तुलना में ज़्यादा भारी पड़ सकते हैं, क्योंकि उनके पास संसाधनों की कमी होती है।
भविष्य की राह
कुल मिलाकर, यह एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन भारतीय MSMEs को ग्लोबल स्टेज पर ज़्यादा कॉम्पिटिटिव बनाने की दिशा में सरकार का एक अहम और रणनीतिक कदम है। TRACE जैसी पहलें, नए FTAs के लागू होने के साथ मिलकर, यह सुनिश्चित करने में मदद करेंगी कि भारतीय कंपनियां, खासकर छोटे और मध्यम उद्योग, ग्लोबल अवसरों का पूरा लाभ उठा सकें। सरकार का लक्ष्य अगले 6-7 सालों में गुड्स और सर्विसेज एक्सपोर्ट्स को $2 ट्रिलियन तक ले जाना है, और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए MSMEs का अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करना और ग्लोबल मार्केट में टिके रहना बहुत ज़रूरी है।
