अंतरराष्ट्रीय समझौतों के जरिए अपनी मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करने और निर्यात लक्ष्यों को हासिल करने की रणनीति के तहत भारत ट्रेड डील्स और संसाधन सुरक्षा के प्रयासों को तेज कर रहा है।
ओमान से FTA: व्यापार को मिलेगी रफ्तार
ओमान के साथ कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA), जिसे फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) भी कहा जाता है, 1 जून, 2026 से प्रभावी होगा। इससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़ेगा, जो मौजूदा समय में ₹10.61 अरब (FY2024-25) तक पहुंच गया है। इस समझौते के तहत भारत अपने 98.08% निर्यात पर 100% ड्यूटी-फ्री एक्सेस पाएगा, जिससे इंजीनियरिंग गुड्स, फार्मा, कृषि, समुद्री उत्पाद, टेक्सटाइल और केमिकल जैसे सेक्टरों को बड़ा फायदा होगा।
चिली से अहम मिनरल्स: 'आत्मनिर्भर भारत' को मिलेगी मजबूती
वहीं, चिली के साथ FTA पर बातचीत तेजी से आगे बढ़ रही है। चिली लिथियम, कॉपर, कोबाल्ट और रेनियम जैसे महत्वपूर्ण मिनरल्स का बड़ा भंडार रखता है, जो भारत के बढ़ते इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), इलेक्ट्रॉनिक्स और क्लीन एनर्जी सेक्टर के लिए बेहद जरूरी हैं। इन मिनरल्स की सप्लाई सुनिश्चित करना भारत के 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर तब जब वैश्विक सप्लाई चेन पर भू-राजनीतिक तनाव का असर दिख रहा है। भारत के नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन (जिसका बजट ₹16,300 करोड़ है और यह 2025 में लॉन्च हुआ) का लक्ष्य लिथियम जैसे खनिजों के लिए आयात पर निर्भरता कम करना है। भारत रूस, ब्राजील, अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से भी मिनरल्स जुटाने के लिए काम कर रहा है ताकि सप्लाई चेन में विविधता लाई जा सके और चीन जैसे देशों पर निर्भरता घटे।
निर्यात लक्ष्य और वैश्विक परिदृश्य
ये सभी कदम भारत के $2 ट्रिलियन के कुल निर्यात लक्ष्य (2030-31 तक) को हासिल करने में मदद करेंगे, जिसमें $1 ट्रिलियन गुड्स और $1 ट्रिलियन सर्विसेज का योगदान होगा। दुनिया भर में, महत्वपूर्ण मिनरल्स को केवल औद्योगिक इनपुट नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति माना जा रहा है, जिनकी सप्लाई चेन भू-राजनीतिक प्रभाव के प्रति संवेदनशील है। चिली के पास लिथियम का विशाल भंडार (अनुमानित 93 लाख मीट्रिक टन) इसे एक प्रमुख साझेदार बनाता है।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि, राह आसान नहीं है। भारत-चिली FTA की बातचीत में कीमत, पर्यावरण नियम और चिली की डोमेस्टिक कंटेंट की शर्तों जैसे मुद्दों पर देरी हो सकती है। भारत अभी भी कई महत्वपूर्ण मिनरल्स के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है और उसके पास प्रोसेसिंग व रिफाइनिंग की पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। वैश्विक आर्थिक मंदी, व्यापार संरक्षणवाद और भू-राजनीतिक अस्थिरता भी इस राह में चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं।
भविष्य की राह
कुल मिलाकर, भारत की व्यापार रणनीति रणनीतिक संसाधनों को सुरक्षित करने और बाजार पहुंच बढ़ाने पर केंद्रित है, जैसा कि ओमान FTA और चिली के साथ मिनरल वार्ताओं से जाहिर होता है। सरकार का $2 ट्रिलियन एक्सपोर्ट लक्ष्य और नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन जैसे प्रयास अधिक लचीली और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनाने की मंशा दिखाते हैं। भविष्य में, भारत का ध्यान व्यापार भागीदारों में विविधता लाने, घरेलू विनिर्माण बढ़ाने और वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका मजबूत करने पर रहेगा, खासकर टेक्नोलॉजी और सस्टेनेबल एनर्जी के क्षेत्र में।
