भारत की ट्रेड स्ट्रैटेजी: एनर्जी ट्रांजीशन के लिए मिनरल्स की तलाश
भारत अब Chile और Oman के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को फाइनल करने की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है। इस स्ट्रैटेजी का मकसद ट्रेड को रीबैलेंस करना और, सबसे अहम, देश की एनर्जी ट्रांजीशन के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स तक पहुंच को सुरक्षित करना है। इन डील्स से मिडिल ईस्ट में तत्काल मार्केट एक्सेस मिलने की उम्मीद है, साथ ही रिन्यूएबल एनर्जी और टेक्नोलॉजी के लिए ज़रूरी मिनरल्स की फ्यूचर सप्लाई चेन भी मजबूत होगी। हालांकि, बातचीत में असमान रियायतें देखने को मिल रही हैं और कमोडिटी मार्केट की जटिल ग्लोबल फोर्सेस भी सामने आ रही हैं।
ओमान डील: टैरिफ में भारी कटौती, पर भारत थोड़ा संभलकर
ओमान के साथ ट्रेड डील, जिसे मई 2026 तक पूरा करने का प्लान है, भारत को बड़े टैरिफ बेनिफिट्स देने वाली है। ओमान अपने 98.08% टैरिफ लाइन्स पर जीरो-ड्यूटी एक्सेस देगा, जो भारत के 99.38% एक्सपोर्ट्स को कवर करेगा। इससे भारत के जेम्स, टेक्सटाइल्स और फार्मा जैसे प्रोडक्ट्स के लिए ओमान का मार्केट खुलेगा। दूसरी ओर, भारत ओमान के इम्पोर्ट्स के लिए सिर्फ 77.79% टैरिफ लाइन्स को ही लिबरलाइज करेगा। भारत ने अपनी पेशकश में टैरिफ-रेट कोटा (tariff-rate quotas) और सेंसिटिव कृषि उत्पादों व कीमती धातुओं (precious metals) को शामिल नहीं किया है, जिससे अपना प्रोटेक्टिव अप्रोच दिखाया है। भले ही ओमान भारत के लिए रिफाइंड पेट्रोलियम का एक अहम सप्लायर है, लेकिन ओमान का भारत के साथ कुल ट्रेड चीन से काफी कम है। वहीं, ओमान में रहने वाले भारतीयों से आने वाला रेमिटेंस (remittances), जो सालाना करीब $2 बिलियन है, भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को काफी मदद करता है।
चिली: भारत के एनर्जी गोल्स के लिए कॉपर सप्लाई बेहद अहम
Chile के साथ FTA की बातचीत पूरी तरह से क्रिटिकल मिनरल्स पर केंद्रित है, जिसके लिए एक स्पेशल चैप्टर भी रखा गया है। चिली, जो कि एक बड़ा कॉपर प्रोड्यूसर है, भारत को चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए एक ज़रूरी मार्केट के तौर पर देखता है। आपको बता दें कि चीन फिलहाल चिली का लगभग आधा कॉपर खरीदता है। भारत को एनर्जी ट्रांजीशन के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की तत्काल ज़रूरत है; हर गीगावाट रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी के लिए लगभग 2,000 टन कॉपर की ज़रूरत पड़ती है। ग्लोबल मिनरल प्रोसेसिंग और प्राइसिंग पर चीन का बड़ा दबदबा होने के कारण मार्केट कंट्रोल और सप्लाई चेन के रिस्क को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। 2026 में कॉपर की कीमतें $11,500-$14,000 प्रति टन के बीच रहने का अनुमान है, जो ग्लोबल इवेंट्स और एनर्जी ट्रांजीशन प्रोजेक्ट्स की डिमांड से प्रभावित होंगी। बेहतर मार्केट एक्सेस के लिए चिली का ऑफर भारत के लिए एक बड़ा अवसर है, जबकि भारत के क्रिटिकल मिनरल इम्पोर्ट्स हाल ही में दोगुने से ज़्यादा हुए हैं।
जोखिम: असमान डील, चीन का दबदबा और ट्रेड गैप
इन ट्रेड वार्ताओं में कई बड़े जोखिम छिपे हैं। असमान टैरिफ लिबरलाइजेशन, जहां ओमान भारत से कहीं ज़्यादा रियायतें दे रहा है, ट्रेड इम्बैलेंस (Trade Imbalance) को और खराब कर सकता है। यह चिंता का विषय है, क्योंकि भारत पहले से ही मजबूत सर्विस एक्सपोर्ट्स और रेमिटेंस के बावजूद बड़े करंट अकाउंट डेफिसिट से जूझ रहा है। लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे क्रिटिकल मिनरल्स के लिए इम्पोर्ट पर भारत की निर्भरता बहुत ज़्यादा केंद्रित है, जिससे कीमतों में बड़े उतार-चढ़ाव और सप्लाई में अचानक कटौती का खतरा बना रहता है। कई क्रिटिकल मिनरल्स, जिनमें निकल, कोबाल्ट और लिथियम शामिल हैं, की प्रोसेसिंग पर चीन का लगभग एकाधिकार (monopoly) है, जो बड़े जियोपॉलिटिकल रिस्क पैदा करता है। पहले के मामलों से पता चला है कि चीन विवादों के दौरान इन रिसोर्सेज का इस्तेमाल कर सकता है। भारत की लिमिटेड प्रोसेसिंग कैपेसिटी की वजह से वैल्यू एडिशन के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे सप्लाई चेन के रिस्क और बढ़ जाते हैं। भारत के FTAs की क्वालिटी पर भी बहस हो रही है, कुछ को 'ट्रेड लाइट' माना जाता है और यह कॉमर्स की बजाय फॉरेन पॉलिसी को ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं। ये डील्स लोकल फर्म्स के कॉम्पिटिशन के लिए तैयार होने से पहले ही भारत में विदेशी सामान का सैलाब ला सकती हैं, जो शॉर्ट-टू-मीडियम टर्म में एक बड़ा जोखिम है।
आउटलुक: मिनरल सिक्योरिटी सबसे अहम
क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन को सुरक्षित करना भारत की ट्रेड पॉलिसी और ग्लोबल एंगेजमेंट को आने वाले समय में और ज़्यादा आकार देगा। इन FTAs की सफलता भारत की ग्लोबल कमोडिटी मार्केट को नेविगेट करने, इम्पोर्ट रिस्क को मैनेज करने और अपनी प्रोसेसिंग कैपेसिटी को बढ़ाने की क्षमता पर टिकी है। एनालिस्ट 2026 के लिए मार्केट अनिश्चितताओं के कारण कॉपर की अलग-अलग कीमतों का अनुमान लगा रहे हैं, लेकिन एनर्जी ट्रांजीशन से इसकी डिमांड मजबूत बनी हुई है। भारत के लिए, मिनरल के सोर्सेज को डायवर्सिफाई करना और ट्रेड टाइज को मजबूत करना अब लॉन्ग-टर्म एनर्जी सिक्योरिटी और इंडस्ट्रियल स्ट्रेंथ के लिए बहुत ज़रूरी है।
