भारत सरकार अमेरिकी संसद के डेमोक्रेटिक नेताओं के साथ मिलकर 'Sanctioning Russia Act' को लेकर कूटनीतिक बातचीत कर रही है। इस बिल में रूसी तेल पर **100%** टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है, जिससे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी पर बड़ा खतरा मंडरा सकता है।
कूटनीतिक हलचल और दबाव
भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने वाशिंगटन में डेमोक्रेटिक प्रतिनिधियों ब्रैड शर्मन और कैथरीन क्लार्क से मुलाकात की है। भारत का साफ संदेश है कि रूसी क्रूड की खरीद हमारी एनर्जी सिक्योरिटी के लिए अनिवार्य है। यह प्रस्तावित कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा के सबसे बड़े आयातकों पर 100% तक का टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है। गौरतलब है कि अगस्त में यह बिल अमेरिकी सीनेट में 86-11 के बहुमत से पास हो चुका है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर की चिंता
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा रिस्क एनर्जी प्रोक्योरमेंट कॉस्ट का बढ़ना है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में, भारत के कुल क्रूड ऑयल इंपोर्ट में रूस की हिस्सेदारी 30.3% थी, जो करीब $40.8 बिलियन के बराबर है। अगर यह टैरिफ लागू होता है, तो कंपनियों को महंगे विकल्पों की ओर रुख करना पड़ेगा, जिससे मैन्युफैक्चरिंग और ट्रांसपोर्ट सेक्टर के मार्जिन पर गहरा असर पड़ सकता है। यह न केवल महंगाई बढ़ाएगा, बल्कि करंट अकाउंट डेफिसिट और करेंसी स्टेबिलिटी के लिए भी चुनौतीपूर्ण होगा।
क्या है बिल का भविष्य?
फिलहाल यह बिल हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अटका हुआ है। हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने संकेत दिए हैं कि 3 नवंबर, 2026 के मिड-टर्म चुनाव से पहले इस पर वोटिंग की संभावना कम है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि भारत की एनर्जी पॉलिसी 1.4 अरब नागरिकों की जरूरतों से तय होगी, न कि बाहरी दबाव से। निवेशकों को सलाह है कि वे अमेरिकी चुनावों के बाद इस बिल की स्थिति पर नजर रखें, क्योंकि यह ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन और भारतीय कंपनियों की कॉस्ट स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव ला सकता है।
