भारत सरकार विदेशी निवेश को और बढ़ाने के लिए अपने द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) मॉडल में बड़े बदलाव करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित सुधारों में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए प्रतीक्षा अवधि को कम करना और संरक्षित निवेश की परिभाषा का विस्तार करना शामिल है।
निवेश के नए नियम: क्या बदल रहा है?
वित्त मंत्रालय ने कैबिनेट के लिए एक नोट तैयार किया है, जिसमें भारत की विदेशी साझेदारों से होने वाले निवेशों को संभालने के ढांचे में संरचनात्मक बदलाव का प्रस्ताव है।
विवाद समाधान में तेजी
सबसे अहम बदलाव विवाद समाधान की प्रक्रिया से जुड़ा है। अभी विदेशी निवेशकों को स्थानीय कानूनी उपायों को खत्म करने के बाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए 5 साल तक इंतजार करना पड़ता है। सरकार अब इस अवधि को घटाकर 1-2 साल करने पर विचार कर रही है। यह बदलाव वैश्विक कंपनियों के लिए एक बड़ी रुकावट को दूर करेगा, जो अक्सर इस लंबी प्रक्रिया को भारतीय बाजार में आने में बाधा मानती हैं।
'निवेश' की बदलती परिभाषा
सरकार 'निवेश' की परिभाषा को भी एक एंटरप्राइज-आधारित मॉडल से एसेट-आधारित मॉडल में बदलने की योजना बना रही है। मौजूदा मॉडल में सुरक्षा अक्सर विशेष व्यावसायिक संस्थाओं तक सीमित होती है। नए एसेट-आधारित मॉडल में, कम से कम 5 साल से रखे गए शेयर और इक्विटी जैसे वित्तीय एसेट्स को भी व्यापक सुरक्षा मिलेगी।
FDI पर असर और आगे की राह
ये चर्चाएं ऐसे समय में हो रही हैं जब देश शुद्ध विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को बढ़ावा देना चाहता है। वित्तीय वर्ष 2026 के अंत तक यह लगभग $7.7 बिलियन था। द्विपक्षीय निवेश संधियां (BITs) राष्ट्रों के बीच शर्तों को तय करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, 2015-2016 में अधिक रूढ़िवादी मॉडल की ओर झुकाव के कारण भारत ने कई पुरानी संधियों को समाप्त कर दिया था, जिससे नए समझौते करना मुश्किल हो गया था।
संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल जैसे देशों के साथ हालिया समझौतों में पहले से ही स्थानीय उपचारों के लिए अधिक लचीली समय-सीमा शामिल है। मॉडल संधि में इन सुधारों को मानकीकृत करने का वर्तमान कदम भारत के निवेश ढांचे को वैश्विक प्रथाओं के अनुरूप लाने के एक व्यापक इरादे को दर्शाता है।
नियामक संप्रभुता और जोखिम
सुधारों का उद्देश्य पूंजी आकर्षित करना है, लेकिन सरकार सार्वजनिक हित में अपने नियमों की क्षमता की रक्षा पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है। प्रस्तावित मॉडल में कराधान, सब्सिडी और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के लिए विशेष 'कट-ऑफ' (carve-outs) शामिल होने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि निवेशकों को स्पष्ट सुरक्षा मिलेगी, लेकिन सरकार इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के अधीन हुए बिना नीतियां लागू करने का अधिकार बनाए रखेगी।
इन बदलावों की प्रभावशीलता कैबिनेट द्वारा अनुमोदित अंतिम पाठ और व्यापार भागीदारों के साथ भविष्य की बातचीत की सफलता पर निर्भर करेगी। निवेशकों के लिए, अगली महत्वपूर्ण जानकारी कैबिनेट की औपचारिक मंजूरी और आगामी द्विपक्षीय व्यापार वार्ता में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा होगी।
