भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच फार्मा व्यापार में जोरदार तेजी आने वाली है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 तक यूके को भारत के दवा निर्यात **981.16 मिलियन अमेरिकी डॉलर** तक पहुंच जाएंगे। इस ग्रोथ की बड़ी वजह दोनों देशों के बीच होने वाला कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) है, जिसका मकसद टैरिफ खत्म कर व्यापारिक रिश्ते मजबूत करना है।
भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच फार्मा सेक्टर में विस्तार का नया दौर शुरू होने वाला है। फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (Pharmexcil) के अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक यूके को भारत से होने वाले दवा निर्यात 981.16 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकते हैं। यह इस सेक्टर के लिए एक मजबूत ग्रोथ ट्रेंड को दर्शाता है, जिसने पिछले वित्तीय वर्ष में लगभग 902.96 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात दर्ज किया था।
CETA डील से मिलेगी रफ्तार
भारत-यूके कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) के लागू होने की उम्मीद इस ग्रोथ आउटलुक का मुख्य कारण है। इस ट्रेड डील का लक्ष्य लगभग सभी फार्मा प्रोडक्ट्स पर टैरिफ खत्म करना है, जिससे भारतीय जेनेरिक दवाएं ब्रिटिश मार्केट में और भी ज्यादा कॉम्पिटिटिव हो जाएंगी। फिलहाल, भारत से यूके भेजे जाने वाले फार्मा शिपमेंट्स में लगभग 90% हिस्सेदारी दवाओं और बायोलॉजिक्स की है।
API की मांग में भी तेजी
यूके भारतीय फार्मा इंडस्ट्री के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है। यह यूरोप में इन एक्सपोर्ट के लिए सबसे बड़ा और दुनिया भर में तीसरा सबसे बड़ा डेस्टिनेशन है। सिर्फ तैयार दवाओं (finished formulations) ही नहीं, बल्कि एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) और बल्क ड्रग्स की मांग में भी बढ़ोतरी देखी गई है। पिछले वित्तीय वर्ष में यह मांग 72.66 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई थी। यह ट्रेंड बताता है कि ब्रिटिश फार्मा कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए भारतीय मैन्युफैक्चरिंग पर तेजी से निर्भर हो रही हैं।
निवेशकों के लिए, यह ट्रेड डील सिर्फ एक्सपोर्ट वॉल्यूम बढ़ाने से कहीं ज्यादा है। इससे रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में गहरे सहयोग और भारतीय मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हालांकि, टैरिफ हटने के बावजूद, कंपनियों के लिए असली फायदा यूके के रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स को पूरा करने और कॉम्पिटिटिव माहौल में लागत को कंट्रोल करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगा।
सेक्टर की चाल पर नजर
ट्रेड आउटलुक पॉजिटिव बना हुआ है, लेकिन भारतीय फार्मा सेक्टर जटिल ग्लोबल दबावों के बीच काम कर रहा है। निवेशकों को कंपनियों द्वारा वॉल्यूम ग्रोथ और प्रॉफिटेबिलिटी के बीच संतुलन बनाने के तरीके पर नजर रखनी चाहिए। ऐतिहासिक रूप से, एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियों को करेंसी में उतार-चढ़ाव, लॉजिस्टिक्स की लागत और अंतरराष्ट्रीय क्वालिटी स्टैंडर्ड्स का पालन करने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
आगे चलकर, फाइनल ट्रेड एग्रीमेंट की स्पेसिफिक टर्म्स और इसके पूरी तरह लागू होने का समय महत्वपूर्ण होगा। निवेशक प्रमुख एक्सपोर्ट-हेवी कंपनियों की तिमाही नतीजों पर भी गौर कर सकते हैं ताकि यह समझ सकें कि वे यूरोपियन रीजन में अपनी मार्केट शेयर और ऑपरेशनल मार्जिन को बेहतर बनाने के लिए इन नई व्यापारिक शर्तों का लाभ कैसे उठाने की योजना बना रहे हैं।
