भारत और ओमान के बीच व्यापारिक रिश्ते एक नए मुकाम पर पहुँच रहे हैं! 1 जून, 2026 से लागू हुए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) के तहत, अब 99.38% भारतीय सामान ओमान में ड्यूटी फ्री पहुंचेंगे। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक वॉल्यूम में तेजी आ रही है, खासकर लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और फार्मा सेक्टर में। यह डील ओमान के पोर्ट्स को खाड़ी और अफ्रीकी बाजारों के लिए एक महत्वपूर्ण गेटवे बनाने का लक्ष्य रखती है, हालांकि निवेशकों को भू-राजनीतिक और नियामक जोखिमों पर नज़र रखनी होगी।
भारत-ओमान व्यापार में आया बड़ा मोड़
भारत और ओमान के बीच व्यापारिक संबंध अब केवल खरीदार-विक्रेता तक सीमित नहीं रहेंगे। 1 जून, 2026 से लागू हुए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) ने इस रिश्ते को एक रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया है। यह समझौता मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और पोर्ट ऑपरेशन्स जैसे सेक्टर्स में लंबी अवधि की रणनीतिक भागीदारी पर जोर देता है।
द्विपक्षीय व्यापार पर असर
आंकड़े बता रहे हैं कि इस समझौते का असर दिखने लगा है। 2024-25 फाइनेंशियल ईयर में द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर $10.61 बिलियन हो गया, जो पिछले साल $8.94 बिलियन था। CEPA लागू होने के बाद, निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। जून 2026 में ही, निर्यात किए गए टैरिफ लाइनों का मूल्य बढ़कर $622.8 मिलियन हो गया, जो मई के $402.7 मिलियन से काफी ज्यादा है। निर्यात किए गए टैरिफ लाइनों की संख्या भी 2,879 से बढ़कर 3,371 हो गई, जो उत्पादों में बढ़ती विविधता का संकेत है।
रणनीतिक पहुंच और सेक्टर के फायदे
इस नए समझौते के तहत, भारतीय निर्यातकों को ओमान में प्रवेश करने वाले 99.38% सामानों पर ड्यूटी फ्री एक्सेस मिलेगा, जो सभी टैरिफ लाइनों के 98.08% को कवर करता है। इसका मकसद खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) क्षेत्र में भारतीय उत्पादों की लागत को कम करना है। ओमान के रणनीतिक पोर्ट्स - सोहर (Sohar), डुक्म (Duqm) और सलालाह (Salalah) - को भारतीय कंपनियों के लिए खाड़ी और पूर्वी अफ्रीका के उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार के रूप में देखा जा रहा है। इससे सप्लाई चेन की बाधाओं को दूर करने में मदद मिल सकती है।
यह समझौता सेवाओं और नियामक मानकों को भी संबोधित करता है। उदाहरण के लिए, USFDA, EMA और UK MHRA जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मंजूरी प्राप्त फार्मास्युटिकल उत्पादों को अब 90 दिनों के भीतर ओमान में मार्केटिंग अथॉराइजेशन मिल जाएगा। इसके अलावा, इस डील से प्रोफेशनल मोबिलिटी भी बढ़ेगी, जिससे भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए ICT रोजगार की सीमा 20% से बढ़कर 50% हो जाएगी।
जोखिम और निगरानी वाले बिंदु
यह व्यापार समझौता नए अवसर तो पैदा करता है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी पेश करता है जिन पर निवेशकों को ध्यान देना चाहिए। पश्चिम एशिया क्षेत्र में भू-राजनीतिक अस्थिरता लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, व्यापार बाधाओं के कम होने से, गैर-संवेदनशील क्षेत्रों में आयात प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। समझौते में डेयरी और कुछ खाद्य तेल जैसे संवेदनशील उद्योगों के लिए घरेलू निर्माताओं की सुरक्षा के लिए बहिष्करण सूची (exclusion lists) शामिल हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच नियामक मानकों में किसी भी भविष्य के अंतर से व्यापार को सुविधाजनक बनाने में जटिलताएं आ सकती हैं।
इस विकास की निरंतरता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय कंपनियां पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का कितनी प्रभावी ढंग से उपयोग करती हैं और क्या वे ओमान के बाजार की नियामक आवश्यकताओं को सफलतापूर्वक पार कर पाती हैं। व्यापार वॉल्यूम पर भविष्य के अपडेट, लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में प्रोजेक्ट घोषणाएं, और प्रोफेशनल मोबिलिटी कोटा पर आगे की प्रगति इस रणनीतिक साझेदारी की गहराई को दर्शाएगी।
