New Zealand और India के बीच नए ट्रेड पैक्ट ने वर्क वीजा की राह आसान कर दी है, जिसके चलते 2026 में वर्क परमिट अप्रूवल में **19.6%** का इजाफा हुआ है। एक तरफ जहां न्यूजीलैंड में भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए नए रास्ते खुल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यूनाइटेड किंगडम (UK) में वीजा की मांग लगातार घट रही है।
भारत और न्यूजीलैंड के बीच 20 अक्टूबर को एक नया फ्री ट्रेड फ्रेमवर्क लागू हुआ है, जिसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच लेबर मोबिलिटी को बढ़ाना है। इस समझौते के तहत, अब 5,000 भारतीय प्रोफेशनल एक साथ न्यूजीलैंड में काम कर सकेंगे। इसके अलावा, डॉक्टरेट ग्रैजुएट्स के लिए 4 साल का पोस्ट-स्टडी वर्क परमिट और 18 से 30 साल के युवाओं के लिए हर साल 1,000 वर्किंग हॉलिडे प्रोग्राम की सुविधा भी शुरू की गई है।
न्यूजीलैंड में बढ़ती डिमांड
जनवरी से अगस्त 2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो न्यूजीलैंड ने भारतीयों को 24,513 वर्क परमिट जारी किए हैं। यह पिछले साल की इसी अवधि के 20,499 परमिट्स की तुलना में 19.6% ज्यादा है। भले ही यह रिकवरी बड़ी है, लेकिन महामारी से पहले के औसत 28,870 परमिट्स से यह अभी भी 15% कम है। फिलहाल, न्यूजीलैंड में जारी होने वाले कुल वर्क परमिट में भारतीयों की हिस्सेदारी 18% तक पहुंच गई है।
UK में छाई सुस्ती
न्यूजीलैंड में बढ़ते अवसरों के उलट, यूनाइटेड किंगडम में भारतीय कामगारों के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। 2026 की दूसरी तिमाही में केवल 7,124 वर्क वीजा ही मंजूर हुए, जो पिछले साल के मुकाबले 16% कम हैं। 2023 के बाद से भारतीयों को मिलने वाले यूके वर्क वीजा में 65% की भारी गिरावट आई है। अब यूके के कुल वर्क वीजा पूल में भारत की हिस्सेदारी 20% से घटकर महज 13% रह गई है।
निवेशकों के लिए संकेत
भारतीय आईटी और सर्विस सेक्टर की कंपनियों के लिए यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण है। कई कंपनियां अपने ग्लोबल प्रोजेक्ट्स के लिए ऑनसाइट वीजा पर निर्भर रहती हैं। जहां न्यूजीलैंड एक उभरता हुआ बाजार है, वहीं यूके में वीजा की कमी उन कंपनियों के लिए सिरदर्द बन सकती है जिनका बड़ा क्लाइंट बेस ब्रिटेन में है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां इन नई वीजा सीमाओं का फायदा कितनी जल्दी उठा पाती हैं।
