व्यापार घाटे के बीच निर्यात बढ़ाने की पहल
भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुआ यह नया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) निर्यात को बढ़ावा देने और व्यापारिक संबंधों को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह समझौता भारत के बढ़ते व्यापार घाटे को कम करने की रणनीति का भी हिस्सा है। 2025-26 के फाइनेंशियल ईयर में भारत का व्यापार घाटा करीब $119.30 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, जिसका मुख्य कारण आयात (imports) का निर्यात (exports) से कहीं तेज़ी से बढ़ना है। मर्चेंडाइज आयात $774.98 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जिससे मर्चेंडाइज व्यापार घाटा $333.19 अरब डॉलर हो गया।
इस FTA के तहत, अब 100% भारतीय निर्यात को न्यूजीलैंड में तुरंत ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा। यह भारत के लिए एक बड़ी राहत है, खासकर टेक्सटाइल और गारमेंट्स जैसे सेक्टरों के लिए, जिन्हें पहले न्यूजीलैंड में 10% तक के टैरिफ (tariff) का सामना करना पड़ता था। भारत के टेक्सटाइल निर्यात, जिसमें हैंडीक्राफ्ट भी शामिल हैं, ने FY26 में 2.1% की वृद्धि दर्ज की और ₹3.16 लाख करोड़ तक पहुँच गए। फार्मा सेक्टर, जिसने FY26 में $31.12 अरब का निर्यात किया, उसे भी इस डील से फायदा हो सकता है, क्योंकि न्यूजीलैंड प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रेगुलेटर्स की मंज़ूरियों को मानेगा। कंप्यूटर और बिज़नेस सर्विसेज़ जैसे महत्वपूर्ण सर्विस एक्सपोर्ट सेक्टरों में भी 11% की वृद्धि (FY25 में $222 अरब) के बाद और तेज़ी की उम्मीद है।
FDI के लक्ष्य पर संशय
समझौते की एक अहम बात न्यूजीलैंड का अगले 15 सालों में भारत में $20 अरब का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) सुगम बनाने का वादा है। हालांकि, यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी लगता है, क्योंकि 2000 से अब तक न्यूजीलैंड से भारत में कुल FDI सिर्फ $88 मिलियन के आसपास रहा है। हाल के वर्षों में यह निवेश सालाना कुछ मिलियन डॉलर ही रहा है। $20 अरब का आंकड़ा छूने के लिए दोनों देशों और उद्योगों को मिलकर ज़बरदस्त प्रयास करने होंगे। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि न्यूजीलैंड के मुख्य निर्यात बाज़ार चीन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया हैं, जिसमें भारत प्रमुखता से शामिल नहीं है।
चुनौतियाँ और भविष्य
यह FTA भारत के लिए निर्यात विविधीकरण (diversification) की ओर एक कदम है, लेकिन यह देश के व्यापार घाटे के दबाव को कम करने में कितना सफल होगा, यह देखना बाकी है। $20 अरब का FDI लक्ष्य, जो ऐतिहासिक निवेश की तुलना में बहुत बड़ा है, के पूरा होने पर संदेह है। इसके अलावा, न्यूजीलैंड के विशेष आयात से भारत के MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) पर दबाव बढ़ सकता है। डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को टैरिफ से बाहर रखा जाना इस समझौते की सीमाओं को भी दर्शाता है। विश्लेषकों का मानना है कि इस FTA की सफलता काफी हद तक दोनों देशों द्वारा उठाए जाने वाले फॉलो-अप कदमों, जैसे निर्यात संवर्धन और निवेश सुविधा पर निर्भर करेगी। भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक मांग में सुस्ती भी निर्यात की संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है।