भारत-कोरिया ट्रेड: $50 अरब का लक्ष्य खतरे में? निवेश की कमी और एक्सपोर्ट बैरियर्स बन रहे बड़ी रुकावट

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत-कोरिया ट्रेड: $50 अरब का लक्ष्य खतरे में? निवेश की कमी और एक्सपोर्ट बैरियर्स बन रहे बड़ी रुकावट
Overview

भारत और दक्षिण कोरिया के बीच व्यापार को 2030 तक **$50 अरब** डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य अब बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। मुख्य बाधाओं में भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए कोरियाई मार्केट में पहुंच मुश्किल होना, भारत में नए कोरियन निवेश का धीमा पड़ना और जटिल व्यापार नियम शामिल हैं।

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भारत-कोरिया आर्थिक साझेदारी पर मंडरा रहे खतरे!

दोनों देशों के बीच हाल ही में घोषित 'संयुक्त रणनीतिक दृष्टिकोण' (Joint Strategic Vision) का मकसद 2030 तक द्विपक्षीय ट्रेड (Bilateral Trade) को $50 अरब तक पहुंचाना है। इस योजना के तहत कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) को मजबूत करने और सप्लाई चेन्स, ग्रीन हाइड्रोजन व न्यूक्लियर पावर जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर है। यह भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को कोरिया की टेक्नोलॉजी से जोड़ने की एक बड़ी कोशिश है, लेकिन कुछ गहरी समस्याएं इस राह में रोड़ा बन सकती हैं।

ट्रेड इम्बैलेंस और एक्सपोर्ट की राह मुश्किल

जहां तक ट्रेड के आंकड़ों का सवाल है, यह लक्ष्य तुरंत ही मुश्किल लगने लगता है। भारत के ग्लोबल ट्रेड में बढ़ोतरी के बावजूद, कोरिया के कुल इंपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी 2009 में 2% से घटकर 2024 में सिर्फ 1% रह गई है। इस दौरान, भारत का दक्षिण कोरिया के साथ ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) चार गुना बढ़कर $16 अरब तक पहुंच गया है। फार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल्स, मरीन प्रोडक्ट्स और लेदर जैसे मुख्य भारतीय एक्सपोर्ट सेक्टर्स, जिनमें भारत की अच्छी पकड़ है, का कोरियन मार्केट में हिस्सा बहुत कम है। उदाहरण के लिए, भारतीय फार्मा एक्सपोर्ट्स, जो ग्लोबल इंपोर्ट का 3% हैं, कोरिया के फार्मा इंपोर्ट मार्केट का 1% से भी कम हिस्सा रखते हैं। इसकी मुख्य वजह लंबी रजिस्ट्रेशन प्रोसेस और सख्त इंपोर्ट नियम हैं, जिन्हें पूरा होने में सालों लग सकते हैं।

धीमा कोरियन इन्वेस्टमेंट और जटिल ट्रेड रूल्स

एक बड़ी चिंता भारत में नए कोरियन इन्वेस्टमेंट का धीमा होना है। 1990 के दशक में सैमसंग (Samsung), एलजी (LG) और हुंडई (Hyundai) जैसी बड़ी कंपनियों से एफडीआई (FDI) की पहली लहर आई थी। लेकिन, इस घोषणा से ठीक पहले के पांच सालों में, भारत के एफडीआई में कोरिया का योगदान घटकर करीब 0.7% रह गया। यह गिरावट कोरिया के ओवरऑल आउटवर्ड एफडीआई ट्रेंड के विपरीत है, जो ग्लोबल सप्लाई चेन रीस्ट्रक्चरिंग के तहत प्री-पेंडमिक स्तर से दोगुना से भी ज्यादा हो चुका है। कोरियन कंपनियां ऑपरेटिंग कॉस्ट कम होने और आसान इन्वेस्टमेंट प्रोसीजर के कारण वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रही हैं। सियोल का यह भी मानना है कि भारत के सीईपीए (CEPA) कमिटमेंट्स जापान जैसे देशों के साथ हुए उसके समझौतों की तुलना में कम महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा, अप्रैल 2025 से भारत के सख्त 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' (Rules of Origin) लागू होने से कोरियन कंपनियों के लिए कंप्लायंस (Compliance) की मांगें बढ़ जाएंगी। उनकी प्रोक्योरमेंट (Procurement) अक्सर ग्लोबल हेडक्वार्टर द्वारा मैनेज की जाती है, न कि लोकल ब्रांचों द्वारा, जिससे ऑपरेशन्स जटिल हो जाते हैं। इन नियमों का मकसद ट्रेड डिफ्लेक्शन (Trade Deflection) को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि वास्तविक वैल्यू एडिशन भारत के अंदर ही हो।

$50 अरब के लक्ष्य के सामने चुनौतियां

2030 तक $50 अरब ट्रेड के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के सामने कई बड़ी बाधाएं हैं। कोरिया में भारतीय सामानों के लिए मार्केट एक्सेस (Market Access) के मुद्दे, खासकर रेगुलेटेड सेक्टर्स जैसे फार्मास्युटिकल्स में, एक बड़ी रुकावट बने हुए हैं। कोरियन निवेश की धीमी गति, 'फास्ट ट्रैक मैकेनिज्म' (Fast Track Mechanism) जैसी पहलों के बावजूद, भारत के इन्वेस्टमेंट क्लाइमेट को लेकर चिंताओं या कोरियन कंपनियों के लिए कहीं और बेहतर विकल्पों का संकेत दे सकती है। उन देशों के साथ ट्रेड पैक्ट्स के विपरीत जो सरल रेगुलेशन देते हैं, भारत के 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' की जटिलताएं और ट्रेड डिफ्लेक्शन पर उसका फोकस उस निवेश को हतोत्साहित कर सकता है जिसकी भारत को तलाश है। ग्लोबल इकोनॉमिक शिफ्ट्स सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन की ओर धकेल रही हैं, लेकिन भारत की सफलता अन्य उभरते बाजारों की तुलना में उसकी कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) और बिजनेस करने में आसानी पर निर्भर करेगी।

सफलता के लिए क्या जरूरी है?

एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि अपग्रेडेड सीईपीए (CEPA) की सफलता मौजूदा ट्रेड फ्रिक्शन (Trade Friction) को दूर करने और इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देने में वास्तविक प्रगति पर निर्भर करती है। जबकि 'संयुक्त रणनीतिक दृष्टिकोण' एक महत्वाकांक्षी भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है, इसे हासिल करने के लिए दोनों देशों द्वारा मार्केट एक्सेस की बाधाओं को दूर करने और लगातार कोरियन इन्वेस्टमेंट के लिए बेहतर माहौल बनाने के लिए निर्णायक पॉलिसी एक्शन्स (Policy Actions) की आवश्यकता है। इन मुख्य मुद्दों को संबोधित करने में विफलता $50 अरब के ट्रेड लक्ष्य को सिर्फ एक उम्मीद भरा सपना बना सकती है, न कि एक यथार्थवादी लक्ष्य।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.