होर्मुज संकट में भारत की 'संतुलन साधने' की कोशिश
यूनाइटेड किंगडम (UK) ने एक बड़ी राजनयिक पहल करते हुए 30 से अधिक देशों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आ रहे गंभीर व्यवधानों पर चर्चा के लिए बुलाया है। यह वही मार्ग है जिससे दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है। भारत की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री की इस बैठक में भागीदारी, ऊर्जा आयात सुनिश्चित करने के लिए न्यू दिल्ली की सीधी भागीदारी के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें मध्य पूर्व से आपूर्ति पर निर्भरता कम करने के लिए रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से विविधता लाना शामिल है। हालांकि, भारत के लगभग 40% तेल आयात इसी मार्ग से होते हैं, ऐसे में मौजूदा संकट एक बड़ा जोखिम पैदा करता है।
बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत का 'सोचा-समझा जोखिम'
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के राजनयिक प्रयासों के बीच, यह साफ दिख रहा है कि वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य बदल रहा है। यूके की अगुवाई वाली इस पहल से अमेरिका की अनुपस्थिति, और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा क्षेत्रीय सहयोगियों पर जलमार्ग को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी डालने के बयान, एक शून्य पैदा कर रहे हैं। इस शून्य को भारत और अन्य ऊर्जा-निर्भर देशों को ही नेविगेट करना होगा। अमेरिका के अपने आंतरिक मामलों पर ध्यान केंद्रित करने का मतलब है कि क्षेत्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी अब अलग-अलग समूहों पर आ रही है। वहीं, बड़े पैमाने पर संघर्ष के डर और कूटनीतिक समाधान की चाहत के चलते यूरोपीय देश इस मामले में खुलकर सामने आने से हिचकिचा रहे हैं। भारत की यह सक्रिय कूटनीति एक 'सोचा-समझा जोखिम' है, जो तत्काल ऊर्जा जरूरतों को क्षेत्रीय अस्थिरता के संभावित विस्तार और लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने के आर्थिक परिणामों के बीच संतुलित करती है।
बाजार पर असर और ऐतिहासिक समानताएं
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जो कई सालों का उच्चतम स्तर है। अमेरिकी गैसोलीन की कीमतें भी $4 प्रति गैलन के करीब पहुंच गई हैं। शिपिंग कंपनियों ने इमरजेंसी सरचार्ज लगाना शुरू कर दिया है, जिसका सीधा असर ग्लोबल फ्रेट रेट्स पर पड़ रहा है। इस व्यवधान का पैमाना इतना बड़ा है कि इसे 'इतिहास का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति व्यवधान' बताया जा रहा है। यह 1970 के दशक के तेल संकटों से भी ज़्यादा गंभीर हो सकता है, हालांकि, आज के समय में वैश्विक भंडार और विविध आपूर्ति श्रृंखलाएं कुछ हद तक राहत दे सकती हैं। लेकिन, तेल, एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) और अन्य सप्लाई चेन पर इसका संयुक्त प्रभाव व्यापक इंफ्लेशन और ग्रोथ शॉक का संकेत दे रहा है। ऐतिहासिक रूप से, 1980 के दशक के 'टैंकर वॉर' सहित इस मार्ग पर व्यवधान देखे गए हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति, जो सीधे सैन्य संघर्ष से प्रेरित है, एक अधिक गंभीर और स्थायी चुनौती पेश करती है।
टकराव और गलत अनुमान का खतरा
कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद, जोखिम अभी भी बना हुआ है। क्षेत्रीय सुरक्षा नेतृत्व से अमेरिका का स्पष्ट अलगाव और सहयोगियों के प्रति उसकी प्रतिकूलता अनिश्चितता को बढ़ाती है और क्षेत्रीय विरोधियों को उकसा सकती है। ईरान की मिसाइलों और ड्रोन का उपयोग करने की क्षमता, ऐसे किसी भी सैन्य प्रयास को बेहद जोखिम भरा बनाती है और निर्णायक समाधान की गारंटी नहीं देती। वर्तमान हमले, जो अक्सर बेतरतीब होते हैं और विभिन्न शिपिंग प्रोफाइल को प्रभावित करते हैं, अप्रत्याशित प्रकृति के हैं। इसके अलावा, राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा नाटो से संभावित वापसी या सहयोगियों के समर्थन को कम करने के सुझाव, समग्र सुरक्षा स्थिति को और अस्थिर करते हैं। ऐसे में भारत जैसे देशों को अपने ऊर्जा सुरक्षा के लिए अधिक जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है। केवल कूटनीति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता है, खासकर तब जब ईरान इस टकराव को अस्तित्व की लड़ाई के रूप में देख रहा हो।
भविष्य की राह और कूटनीतिक समाधान
यूके के नेतृत्व वाली यह पहल सुरक्षित शिपिंग को बहाल करने के लिए 'सभी व्यवहार्य कूटनीतिक और राजनीतिक उपायों' का पता लगाने का लक्ष्य रखती है। यूरोपीय देश, जो शुरू में शामिल होने की चिंता के कारण हिचकिचा रहे थे, अब गंभीर आर्थिक प्रभावों और ट्रम्प के कूटनीतिक दांव-पेंच के दबाव में अपनी स्थिति का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं। फ्रांस, नीदरलैंड और खाड़ी देशों सहित कई देश एक गठबंधन में संभावित नौसैनिक योगदान पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि, अंतिम रणनीति व्यापक राजनीतिक समझौतों पर निर्भर करेगी। विश्लेषकों का सुझाव है कि खाड़ी क्षेत्र के लिए प्राथमिकता तनाव कम करना और कूटनीति है, जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी मजबूत क्षेत्रीय संबंधों के चलते एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन सामूहिक प्रयासों की प्रभावशीलता, वर्तमान संकट को तेल की कीमतों की अस्थिरता से आगे बढ़कर व्यापक इंफ्लेशन और ग्रोथ शॉक में बदलने से रोकने के लिए महत्वपूर्ण होगी।