कैपिटल गेन्स और डिविडेंड पर बदलेंगे नियम
इस समझौते के सबसे बड़े बदलावों में से एक है कैपिटल गेन्स (Capital Gains) पर टैक्स का तरीका। अब फ्रांस के निवेशकों को अपने शेयर बेचने पर होने वाले मुनाफे पर भारत में टैक्स देना होगा, भले ही उनकी हिस्सेदारी कम हो। पहले, भारत के पास तब तक टैक्स लगाने का अधिकार सीमित था जब तक फ्रेंच कंपनियों की हिस्सेदारी 10% से ज्यादा न हो। यह बदलाव फ्रांस के पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनका नवंबर 2025 तक भारतीय इक्विटी में करीब $22.69 बिलियन का निवेश था।
डिविडेंड (Dividend) के मामले में, अब दो-स्तरीय व्यवस्था होगी। अगर कोई फ्रेंच कंपनी किसी भारतीय कंपनी में कम से कम 10% हिस्सेदारी रखती है, तो उसे 5% का कम डिविडेंड टैक्स रेट लगेगा। यह पहले के 10% रेट से कम है। वहीं, छोटी हिस्सेदारी ( 10% से कम) वाले निवेशकों के लिए यह रेट बढ़ाकर 15% कर दिया गया है। यह नई व्यवस्था बड़े, रणनीतिक निवेशकों को ज्यादा फायदा पहुंचाएगी।
टेक्निकल सर्विसेज और MFN क्लॉज में भी बदलाव
'फीस फॉर टेक्निकल सर्विसेज' (Fees for Technical Services) से जुड़े नियमों को भारत-अमेरिका ट्रीटी के जैसा बनाया गया है, जिससे टैक्स के दायरे को सीमित किया जा सकता है। सामान्य सलाह या सपोर्ट सेवाओं पर तब तक टैक्स नहीं लगेगा जब तक उनमें खास 'नो-हाउ' (know-how) शामिल न हो। इसके अलावा, मोस्ट-फेवर्ड-नेशन (MFN) क्लॉज को ट्रीटी से हटा दिया गया है। इसका मकसद ट्रीटी की व्याख्या से जुड़े विवादों को सुलझाना है और यह भारत की उस नीति के अनुरूप है जिसमें वह अन्य देशों के साथ हुए संशोधनों में भी ऐसे क्लॉज को हटा रहा है।
परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट (PE) का दायरा बढ़ा
'परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट' (Permanent Establishment) की परिभाषा को 'सर्विस PE' (Service PE) को शामिल करके बढ़ाया गया है। इसका मतलब है कि अगर किसी विदेशी कंपनी के कर्मचारी भारत में कुछ समय के लिए सेवाएं देते हैं, तो उस कंपनी को भारत में टैक्स के दायरे में माना जा सकता है। इससे क्रॉस-बॉर्डर सर्विस के लिए टैक्स बेस बढ़ सकता है।
वैश्विक ट्रेंड्स के साथ तालमेल
भारत-फ्रांस DTAC में यह संशोधन OECD के BEPS (Base Erosion and Profit Shifting) पहल का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य टैक्स अधिकारों को सोर्स देशों की ओर अधिक झुकाना है। भारत का कैपिटल गेन्स पर टैक्स बढ़ाने का कदम नया नहीं है; मॉरीशस और सिंगापुर के साथ हुए समझौतों में भी ऐसे बदलाव देखे गए हैं। BEPS MLI प्रावधानों को शामिल करने से भारत अंतरराष्ट्रीय टैक्स पारदर्शिता मानकों के साथ और मजबूत हुआ है। भारत और फ्रांस के बीच द्विपक्षीय व्यापार FY25 में लगभग $15.21 बिलियन तक पहुंच गया है, और फ्रांस भारत में एक महत्वपूर्ण निवेशक है। इस ट्रीटी के आधुनिकीकरण से निवेश के लिए टैक्स की निश्चितता बढ़ेगी, जो अप्रैल 2000 से मार्च 2025 तक फ्रांस से आए $11.75 बिलियन के FDI को देखते हुए महत्वपूर्ण है।
विभिन्न सेक्टरों और निवेशकों पर असर
इन बदलावों का विभिन्न सेक्टरों पर खास असर पड़ेगा। भारत में बड़ी मौजूदगी वाली फ्रेंच मल्टीनेशनल कंपनियों, जैसे Capgemini या Sanofi, को कम डिविडेंड टैक्स रेट से फायदा हो सकता है। हालांकि, जो कंपनियां सामान्य टेक्निकल सर्विसेज पर निर्भर हैं, उनके टैक्स की गणना पर असर पड़ सकता है। भारत के बढ़े हुए कैपिटल गेन्स टैक्स अधिकार फ्रेंच निवेशकों के कुल टैक्स बोझ को प्रभावित कर सकते हैं। MFN क्लॉज के हटने से ट्रीटी की व्याख्या आसान होगी, लेकिन फ्रांस को अब अन्य देशों के लिए तय की गई कम दरों का स्वतः लाभ नहीं मिलेगा।
संभावित कमजोरियां
छोटे निवेशकों के लिए डिविडेंड टैक्स का बढ़ना शायद उन्हें निवेश से हतोत्साहित करे। 'सर्विस PE' की परिभाषा के विस्तार से फ्रेंच कंपनियों को अपने कर्मचारियों द्वारा भारत में दी जाने वाली सेवाओं की अवधि पर बारीकी से नज़र रखनी होगी ताकि अनजाने में टैक्स देनदारी से बचा जा सके। हालांकि ट्रीटी का मकसद स्पष्टता लाना है, 'सर्विस PE' के नियम और विभिन्न वित्तीय साधनों पर कैपिटल गेन्स रूल्स की बारीकियां अभी भी व्याख्या संबंधी चुनौतियां पेश कर सकती हैं।
