भारत और फ्रांस के बीच 1992 से चला आ रहा डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस कन्वेंशन (DTAC) अब नए रूप में सामने आया है। 23 फरवरी, 2026 से लागू होने वाले एक महत्वपूर्ण प्रोटोकॉल के ज़रिए, दोनों देशों के बीच टैक्स नियमों को काफी हद तक बदल दिया गया है। इस नए समझौते का मकसद वैश्विक टैक्स मानकों को अपनाना और भारत की 'सोर्स-बेस्ड टैक्सेशन' यानी जहां से आय हो रही है, वहां टैक्स लगाने की रणनीति को मज़बूत करना है। यह बदलाव फ्रांस के निवेशकों और वहां की कंपनियों के लिए भारत में निवेश को कुछ हद तक महंगा बना सकता है।
कैपिटल गेंस पर भारत की बढ़ी ताकत
इस संशोधित समझौते का सबसे अहम पहलू यह है कि अब भारत को उन कैपिटल गेंस पर टैक्स लगाने का पूरा अधिकार मिल गया है जो किसी कंपनी के शेयर्स की बिक्री से होते हैं। इसका सीधा मतलब है कि अगर कोई फ्रेंच कंपनी भारतीय कंपनी के शेयर बेचती है, तो भारत अब उस पर कैपिटल गेंस टैक्स लगा सकेगा, चाहे उसकी हिस्सेदारी कितनी भी छोटी क्यों न हो। पहले, अगर फ्रेंच कंपनियों की हिस्सेदारी 10% से कम होती थी, तो उन्हें भारत में कैपिटल गेंस टैक्स से छूट मिल जाती थी। लेकिन अब यह नियम बदल गया है। यह बदलाव भारत के मॉरीशस और सिंगापुर के साथ हुए संशोधित समझौतों जैसा ही है। आपको बता दें कि जनवरी 2026 तक, फ्रांस के विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) के पास भारतीय इक्विटी में करीब $21 बिलियन का निवेश था। ऐसे में, यह नया नियम उनके बाहर निकलने की रणनीति (exit strategies) को प्रभावित कर सकता है और ऐसे सौदों पर ज़्यादा जांच की उम्मीद है।
डिविडेंड पर टैक्स का नया ढांचा
डिविडेंड पर लगने वाले विदहोल्डिंग टैक्स (withholding tax) की दर में भी बदलाव किया गया है। अब पहले की एक समान 10% की दर की जगह एक नया 'टियर्ड' यानी अलग-अलग स्लैब वाला सिस्टम लागू होगा:
- 5% की दर: अगर किसी फ्रेंच कंपनी की किसी भारतीय कंपनी में 10% या उससे ज़्यादा की हिस्सेदारी है, तो उसे डिविडेंड पर केवल 5% टैक्स देना होगा। यह कदम लंबी अवधि के निवेश को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है।
- 15% की दर: वहीं, जिन निवेशकों की हिस्सेदारी 10% से कम है, यानी छोटे शेयरहोल्डर्स, उन्हें डिविडेंड पर 15% टैक्स चुकाना पड़ेगा। यह नया ढांचा बड़े और ठोस निवेश को प्रोत्साहित करेगा, जबकि छोटे शेयरधारकों पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा।
सर्विस PE और FTS में बदलाव
समझौते में 'परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट' (PE) की परिभाषा का विस्तार किया गया है, जिसमें अब 'सर्विस PE' को भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि अगर कोई विदेशी कंपनी भारत में अपने कर्मचारियों के ज़रिए एक निश्चित अवधि तक सेवाएं प्रदान करती है, तो उसे भारत में टैक्सेबल उपस्थिति (taxable presence) माना जाएगा। यह खासकर कंसल्टिंग, इंजीनियरिंग और प्रोजेक्ट-आधारित सेवा प्रदाताओं को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, 'फीस फॉर टेक्निकल सर्विसेज' (FTS) का दायरा भी सीमित किया गया है, जो भारत-अमेरिका टैक्स संधि के 'मेक अवेलेबल' क्लॉज के अनुरूप है।
MFN क्लॉज हटा, अब 'ट्रीटी शॉपिंग' पर शिकंजा
एक और अहम बदलाव यह है कि 'मोस्ट-फेवर्ड-नेशन' (MFN) क्लॉज को हटा दिया गया है। पहले यह क्लॉज फ्रांस को भारत द्वारा किसी अन्य ओईसीडी (OECD) देश को दी गई ज़्यादा बेहतर टैक्स सुविधाओं का लाभ उठाने की अनुमति देता था। इसके हटने से टैक्स संबंधी विवादों को कम करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, ओईसीडी के बेस इरोजन एंड प्रॉफिट शिफ्टिंग (BEPS) मानकों के अनुरूप, 'प्रिंसिपल पर्पस टेस्ट' (PPT) जैसे एंटी-अ abuso (दुरुपयोग-रोधी) उपायों को भी शामिल किया गया है, ताकि 'ट्रीटी शॉपिंग' यानी संधि का गलत इस्तेमाल रोका जा सके। दोनों देशों के बीच टैक्स संबंधी जानकारी के आदान-प्रदान और मदद के प्रावधानों को भी मज़बूत किया गया है।
निवेशकों के लिए क्या मायने?
यह नया समझौता भारत के टैक्स राजस्व को बढ़ाने और संधि की अस्पष्टताओं को दूर करने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है, लेकिन यह कुछ फ्रेंच निवेशकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण माहौल बना सकता है। खासकर 10% से कम हिस्सेदारी वाले पोर्टफोलियो निवेशकों को कैपिटल गेंस टैक्स में सीधे बढ़ोतरी का सामना करना पड़ेगा, जो कि पहले की छूट के बिल्कुल विपरीत है। माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स के लिए डिविडेंड पर ज़्यादा टैक्स दरें उनके नेट रिटर्न को और कम कर सकती हैं। यह देखते हुए कि जनवरी 2026 तक फ्रांस-आधारित FPIs का भारत में इक्विटी में बड़ा निवेश था, इन बढ़ी हुई लागतों का असर अंतिम लाभार्थियों तक पहुँच सकता है। इसके अलावा, सर्विस PE प्रावधानों के जुड़ने से भारत में सेवाएं देने वाले व्यवसायों को अपने ऑपरेशनल ढांचे का पुनर्मूल्यांकन करना होगा, जिससे अनुपालन की जटिलता बढ़ सकती है।
आगे का रास्ता
यह संशोधन भारत की स्पष्ट कर नीति को दर्शाता है: संधि लाभों को कसना, संधि के दुरुपयोग को रोकना और स्रोत-देश कराधान को मज़बूत करना। यह भारत की उस व्यापक रणनीति के अनुरूप है जिसका उद्देश्य वास्तविक, लंबी अवधि के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करना है, साथ ही अपने टैक्स बेस को सुरक्षित रखना है। भारत में परिचालन या निवेश करने वाली फ्रेंच कंपनियों को सलाह दी जाती है कि वे अपने ढांचे का सक्रिय रूप से पुनर्मूल्यांकन करें और उभरते टैक्स नियमों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए भविष्य की निवेश और व्यावसायिक योजनाओं में संशोधित संधि परिदृश्य को ध्यान में रखें। यह प्रोटोकॉल दोनों देशों में आंतरिक कानूनी प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद लागू होगा।