EU के सख्त मानक: भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए बड़ी चुनौती
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हाल ही में फाइनल हुई फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) सिर्फ टैरिफ कम करने का सौदा नहीं है, बल्कि यह भारतीय कंपनियों को अपने कामकाज के तरीके बदलने पर मजबूर कर रही है। इस डील से जहां 90% से ज्यादा सामानों पर कस्टम ड्यूटी खत्म या कम हो जाएगी, वहीं यूरोप के सख्त रेगुलेशन, एनवायरनमेंट और क्वालिटी के नियम कंपनियों के लिए असली इम्तिहान साबित होंगे।
सेक्टरों में दिखेगा 'विजेता' और 'शिकार' का फर्क
खासकर टेक्सटाइल, फार्मा और केमिकल जैसे सेक्टरों में पहले 12-22% तक लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी खत्म होने से भारतीय एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत मिलेगी। बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स अब EU के बड़े अपैरल मार्केट में बिना ड्यूटी के पहुंच पाएंगे। फार्मा और केमिकल एक्सपोर्ट्स में भी ग्रोथ की उम्मीद है। लेकिन, इन सब के साथ EU के कड़े नियम, जैसे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) और सस्टेनेबिलिटी से जुड़े कायदे, खासकर छोटी और मध्यम कंपनियों (MSMEs) के लिए भारी पड़ सकते हैं। इन नियमों को पूरा करने के लिए कंपनियों को अपने प्रोडक्शन प्रोसेस में ग्रीन एनर्जी और क्लीन टेक्नोलॉजी जैसे कामों में भारी निवेश करना होगा।
बड़ी कंपनियां फायदे में, MSMEs पर पड़ेगा बोझ
इस डील का असर साफ तौर पर दो हिस्सों में बंटेगा। जो कंपनियां पहले से ग्लोबल स्टैंडर्ड्स और सस्टेनेबिलिटी पर फोकस कर रही हैं, वे इसका खूब फायदा उठाएंगी। टेक सेक्टर की बड़ी कंपनियां जैसे TCS और Infosys, जिनकी वैल्यूएशन 17.11 और 15.73 के P/E रेश्यो पर है, वे EU मार्केट में अपनी पकड़ मजबूत करेंगी। वहीं, जो कंपनियां इन स्टैंडर्ड्स के लिए तैयार नहीं हैं, वे पिछड़ जाएंगी। 2026 से लागू होने वाले CBAM के तहत कार्बन फुटप्रिंट वाले सामानों पर चार्ज लगेगा, जिसका सीधा असर स्टील और सीमेंट एक्सपोर्टर्स पर पड़ेगा, जिनके पास जरूरी डेटा और टेक्नोलॉजी की कमी हो सकती है। MSMEs के लिए एक्सपोर्ट फाइनेंसिंग में पहले से मौजूद 284 बिलियन डॉलर की कमी और बढ़ जाएगी, जहां फॉर्मल सोर्सिंग मांग का सिर्फ 28.5% ही पूरा कर पाती है। इन सब के चलते, बेहतर फाइनेंसियल तैयारी और स्टैंडर्ड्स को पूरा करने की स्पष्ट योजना के बिना, ये MSMEs यूरोपीय बाजार से बाहर हो सकती हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और डोमेस्टिक कंपीटिशन भी बड़ी चुनौतियां
कंप्लायंस कॉस्ट के अलावा, भारत के लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजनेस एनवायरनमेंट की दिक्कतें भी एक्सपोर्टर्स की राह मुश्किल बना रही हैं। भले ही FTA से भारतीय सप्लायर EU सप्लाई चेन से जुड़ेंगे, लेकिन SAP जैसी बड़ी टेक कंपनियों का 23.40-24.20 P/E रेश्यो दिखाता है कि स्थापित खिलाड़ियों का काम करने का तरीका अलग है। भारतीय ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स को भी यूरोपियन ब्रांड्स से कड़ी टक्कर मिलेगी, जो क्वालिटी और टेक्नोलॉजी के लिए जाने जाते हैं। कार इंपोर्ट पर ड्यूटी 110% से घटकर 10% तक आ सकती है, जिससे Tata Motors जैसी कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। डील के तहत भारत में प्रीमियम यूरोपीय सामान, कारें और खाने-पीने की चीजें भी आएंगी, जो डोमेस्टिक बिजनेस के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करेंगी।
लंबी अवधि का निवेश है यह डील
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंडिया-EU FTA का पूरा असर दिखने में कुछ साल लगेंगे। शुरुआती फायदे FY2027 से और बड़े प्रभाव FY2028 से दिखने की उम्मीद है। यह डील एक लंबी अवधि का बदलाव है, जो भारत की स्ट्रक्चरल दिक्कतों को दूर करने और कंपनियों के क्वालिटी, कंप्लायंस और सस्टेनेबिलिटी में निवेश पर निर्भर करेगा। जो कंपनियां इन हायर स्टैंडर्ड्स को पूरा कर पाएंगी, वे ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनेंगी, जबकि बाकी कंपनियां पीछे रह जाएंगी।
