भारत-EU ट्रेड डील: 5 साल बाद MFN का भविष्य भारतीय छात्रों की आवाजाही पर निर्भर, CBAM का बड़ा खतरा!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत-EU ट्रेड डील: 5 साल बाद MFN का भविष्य भारतीय छात्रों की आवाजाही पर निर्भर, CBAM का बड़ा खतरा!
Overview

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच एक महत्वपूर्ण फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को अंतिम रूप दिया गया है। इस डील के तहत, दोनों देशों के बीच सर्विसेज (Services) के व्यापार में 5 साल के लिए 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) का दर्जा दिया गया है। हालांकि, इस दर्जे का भविष्य भारतीय छात्रों के EU में आने-जाने और रुकने की सुगमता पर निर्भर करेगा।

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MFN स्टेटस का अनोखा क्लॉज़: छात्र मोबिलिटी से जुड़े फायदे

हाल ही में सामने आए भारत-यूरोपीय संघ (EU) फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के अस्थायी मसौदे (provisional text) में सर्विसेज (Services) ट्रेड के लिए 5 साल का 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) स्टेटस शामिल है। इसका सीधा मतलब है कि भारत और EU एक-दूसरे को उन तीसरे देशों से बेहतर ट्रेड शर्तें देंगे, जिन्हें वे पहले से ही सबसे ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं। लेकिन, इस MFN दर्जे का असली खेल आगे छिपा है। इस 5 साल की अवधि के बाद मिलने वाले फायदे इस बात पर निर्भर करेंगे कि भारत EU में भारतीय छात्रों के आने-जाने, रहने और काम करने के नियमों को कितना आसान बनाता है, और सामाजिक सुरक्षा समझौते (social security agreements) कितनी जल्दी फाइनल होते हैं। EU इस MFN प्रावधान को इंसानी पूंजी (human capital) की आवाजाही और सामाजिक कल्याण समझौतों को आगे बढ़ाने के लिए एक अहम ज़रिया बना रहा है।

चौथे साल होगी समीक्षा, तभी तय होगा आगे का रास्ता

डील के लागू होने के चौथे साल में एक उच्च-स्तरीय ज्वाइंट कमेटी (joint committee) इस पूरे मामले की गहन समीक्षा करेगी। यह कमेटी इस बात का जायजा लेगी कि EU देशों में भारतीय छात्रों की पहुंच, उनके रहने के अधिकार और काम करने के नियमों में कितनी प्रगति हुई है। साथ ही, सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा समझौतों या इसी तरह के अन्य व्यवस्थाओं की स्थिति का भी आकलन किया जाएगा। इन सभी मूल्यांकनों के आधार पर ही कमेटी यह तय करेगी कि शुरुआती 5 साल के बाद MFN ट्रीटमेंट को आगे बढ़ाया जाए या नहीं। यह दर्शाता है कि ट्रेड फायदों का सीधा संबंध खास सामाजिक-मोबिलिटी (socio-mobility) डिलीवरेबल्स से जोड़ा गया है। बातचीत की यह प्रक्रिया खुद में एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि ये शुरुआती बातचीत लगभग 20 साल पहले शुरू हुई थी।

ट्रेड वॉल्यूम, टैरिफ कटौती और 'CBAM' का बड़ा सवाल

भारत और EU के बीच मर्चेंडाइज ट्रेड (merchandise trade) 2024-25 में लगभग $136.54 बिलियन और सर्विसेज ट्रेड 2024 में $83.10 बिलियन तक पहुँच चुका है, जो दोनों के बीच मजबूत आर्थिक संबंधों को दिखाता है। इस FTA का लक्ष्य इस एकीकरण को और गहरा करना है। EU अपनी 90% से अधिक टैरिफ लाइनों पर और भारत 86% लाइनों पर ड्यूटी खत्म करेगा। डील में सर्विसेज के नियम WTO के जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड इन सर्विसेज (GATS) पर आधारित हैं, लेकिन इसमें EU के नए FTAs की कई खूबियाँ शामिल हैं। यह IT, बैंकिंग, फाइनेंस और प्रोफेशनल सर्विसेज जैसे सेक्टरों में मौके बढ़ाएगा और योग्य पेशेवरों की अस्थायी आवाजाही (temporary movement) को आसान बनाएगा।

हालांकि, एक बड़ी बाहरी चुनौती EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) है। भले ही FTA के टेक्स्ट में CBAM के तहत तीसरे देशों को दी गई कुछ फ्लेक्सिबिलिटी का ज़िक्र है, लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत को कोई खास छूट नहीं मिलेगी। इससे एक विसंगति पैदा होती है: EU के सामान भारत में ड्यूटी-फ्री आ सकते हैं, जबकि भारत के एक्सपोर्ट्स, खासकर स्टील और एल्युमीनियम जैसे कार्बन-इंटेंसिव प्रोडक्ट्स पर यूरोप में कार्बन टैक्स लग सकता है, जिससे FTA के टैरिफ फायदे कम हो सकते हैं।

अनिश्चितताएं और जोखिम: कहां फंस सकता है मामला?

MFN प्रावधान को आगे बढ़ाने की 'कंडीशनल' प्रकृति ही सबसे बड़ा जोखिम है। अगर भारतीय छात्र मोबिलिटी या सामाजिक सुरक्षा समझौतों पर प्रगति धीमी रही, तो 5 साल बाद ट्रेड की बेहतर शर्तें खत्म हो सकती हैं, जिससे भारतीय व्यवसायों को ज़्यादा MFN ड्यूटीज़ का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, EU का CBAM, जो FTA के दायरे से बाहर है, एक महत्वपूर्ण खतरा पैदा करता है। भारतीय एक्सपोर्टर्स, खासकर छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों (MSMEs) को कंप्लायंस के लिए आवश्यक जटिल कार्बन अकाउंटिंग से जूझना पड़ सकता है, और उन्हें भारी टैक्स या बाजार से बाहर होने का सामना करना पड़ सकता है। रूस और इंडोनेशिया जैसे कई देशों ने WTO की कंसिस्टेंसी को लेकर CBAM पर चिंता जताई है।

आगे का रास्ता: संतुलन और उम्मीदें

MFN प्रावधान की शुरुआती 5 साल की अवधि के बाद सफलता और लंबी अवधि की निरंतरता चौथे साल में ज्वाइंट कमेटी के मूल्यांकन पर टिकी होगी। यह मूल्यांकन, जो छात्र मोबिलिटी और सामाजिक सुरक्षा पैक्ट्स पर केंद्रित होगा, ही आगे के ट्रेड संबंधों को तय करेगा। FTA का व्यापक स्वरूप, जिसमें गुड्स, सर्विसेज, डिजिटल ट्रेड और इन्वेस्टमेंट शामिल हैं, इसे गहरे आर्थिक संरेखण को बढ़ावा देने वाला एक रणनीतिक साझेदारी बनाता है। हालांकि, CBAM जैसे बाहरी नियमों की जटिलताओं से निपटना और मोबिलिटी व सामाजिक सुरक्षा समझौतों पर ठोस प्रगति हासिल करना इस ऐतिहासिक व्यापार समझौते की पूरी क्षमता को साकार करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.