यूरोपीय संघ (EU) के भारत में राजदूत Herve Delphin ने भरोसा जताया है कि यूरोपीय संसद इस डील को आसानी से मंजूरी दे देगी, क्योंकि इसे मजबूत राजनीतिक समर्थन हासिल है। आमतौर पर, इस तरह की मंजूरी प्रक्रिया में लगभग एक साल लग जाता है, जिससे डील के 2027 तक लागू होने की संभावना मजबूत होती है।
यूरोपीय कंपनियों के लिए चिंता का एक बड़ा कारण डील से निवेश सुरक्षा नियमों (Investment Protection Rules) का बाहर रहना है। ये फर्में भारत में अपने निवेश को बढ़ाने के लिए अनुकूल माहौल चाहती हैं। EU का सुझाव है कि डील शुरू होने के दो साल बाद इन नियमों पर बात की जाएगी। इस अधूरापन से निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है और यूरोपीय कंपनियों को अन्य देशों की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी स्थिति में डाल सकता है, जिससे गहरे आर्थिक संबंधों में बाधा आ सकती है।
ऑटो इंडस्ट्री पर इसका सीधा असर दिख रहा है। डील के तहत EU से आयात होने वाली गाड़ियों पर ड्यूटी (Tax) में भारी कटौती की उम्मीद थी, जो मौजूदा 100% से घटकर प्रीमियम कारों के लिए 40% या 10% तक आ सकती है। लेकिन, BMW Group India के प्रेसिडेंट और CEO, Hardeep Singh Brar के मुताबिक, कीमतों में संभावित कमी की उम्मीद में भारतीय खरीदार अपनी खरीदारी टाल सकते हैं। इससे मौजूदा बाजार की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। हालांकि, ऑटो पार्ट्स पर ड्यूटी शून्य होने की बात है।
मुख्य FTA के साथ-साथ, एक अलग 'इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन एग्रीमेंट' (IPA) और 'जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स' (GIs) पर भी बातचीत जारी है। भारत और EU के बीच वस्तुओं और सेवाओं का मौजूदा कारोबार $190 बिलियन से अधिक है, जो दोनों के बीच मजबूत आर्थिक जुड़ाव को दर्शाता है। यह डील ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अस्थिरता का सामना कर रही है।
