टैरिफ पर नियमों की बढ़त: FTA का नया अंदाज़
यह नया इंडिया-ईयू FTA पारंपरिक टैरिफ लिबरलाइजेशन (tariff liberalization) से एक कदम आगे है। इसमें रेगुलेटरी कन्वर्जेंस (regulatory convergence) और महत्वपूर्ण सेक्टर्स में नियम-कानून तय करने पर गहरा जोर दिया गया है। यह आर्थिक साझेदारी को एक जटिल चरण में ले जा रहा है, जहां नियम-आधारित एकीकरण (rules-based integration) के मायने ज्यादा होंगे। इस कदम के पीछे भू-राजनीतिक (geopolitical) वजहें भी हैं, क्योंकि दोनों पक्ष अमेरिकी और चीनी व्यापार पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। हालाँकि, फरवरी 27, 2026 को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स में 1% से ज़्यादा की गिरावट आई थी, जबकि यूरोपीय बाज़ार करीब रिकॉर्ड हाई पर थे। लेकिन इस FTA का तात्कालिक असर टैरिफ कटौती से ज़्यादा नई रेगुलेटरी रिक्वायरमेंट्स (regulatory requirements) के अनुकूल ढलने पर दिखेगा।
IP, डेटा और सस्टेनेबिलिटी: गहरी पैठ और नई मुश्किलें
FTA का इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) चैप्टर 'ट्रिप्स-प्लस' (TRIPS-Plus) मानकों को बढ़ावा देता है, जिससे ट्रेडमार्क, कॉपीराइट और डिजाइन के लिए सुरक्षा मजबूत होगी। यह EU की 'ब्रसेल्स इफेक्ट' (Brussels Effect) कही जाने वाली रणनीति के अनुरूप है, जहाँ वे अपने उच्च-मानक रेगुलेटरी तरीकों को निर्यात करते हैं। हालांकि, यह भारत के जेनेरिक फार्मास्युटिकल उद्योग और घरेलू नवाचार (innovation) क्षमता के लिए चुनौतियां पेश कर सकता है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य विचारों के साथ IP अधिकारों के एक अलग संतुलन पर निर्भर करता है। इसी तरह, डिजिटल ट्रेड के प्रावधान डेटा प्रवाह को सुगम बनाते हैं, लेकिन प्राइवेसी और सुरक्षा के लिए रेगुलेटरी अधिकार बनाए रखते हैं। यह भारतीय फर्मों को EU के कड़े डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क में एकीकृत कर सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि आईटी सर्विसेज को बेहतर गतिशीलता (mobility) और सहयोग से लाभ होगा, लेकिन IP मानकीकरण (harmonization) और डेटा शासन (data governance) के व्यापक निहितार्थों का अभी भी मूल्यांकन किया जा रहा है।
असली चुनौतियां: CBAM और SMEs पर बोझ
इस समझौते की क्षमता के बावजूद, महत्वपूर्ण चुनौतियां बनी हुई हैं। EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) भारतीय निर्यातकों, खासकर स्टील और एल्युमीनियम जैसे कार्बन-गहन क्षेत्रों के लिए एक बड़ी चिंता है। FTA में CBAM को लेकर भारत के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है, जिसका मतलब है कि भारतीय कंपनियों को एम्बेडेड उत्सर्जन (embedded emissions) की लागत वहन करनी होगी, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता (competitiveness) कम हो सकती है। सस्टेनेबिलिटी (sustainability) पर यह जोर लेबर और पर्यावरण मानकों तक भी फैला है, जो भारतीय निर्माताओं के लिए EU बाजार तक पहुंचने के लिए आवश्यक ऑडिट, प्रमाणन और सप्लाई चेन समायोजन की लागतों को बढ़ा सकता है। छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों (SMEs) को नई EU मानकों द्वारा आवश्यक लागतों को वहन करने में विशेष रूप से कठिनाई हो सकती है। इसके अलावा, ज्योग्राफिकल इंडिकेशन्स (GIs) पर विवाद भी संभावित हैं, जहाँ EU अपने उत्पादों के लिए विस्तारित मान्यता चाहता है, जो 'बासमती' चावल जैसे भारतीय व्यवसायों को प्रभावित कर सकता है।
भविष्य का नज़रिया
जैसे-जैसे FTA पूरी तरह से लागू होगा, जिसके शुरुआती लाभ FY 2027 से और अधिक स्पष्ट प्रभाव FY 2028 से अपेक्षित हैं, दोनों अर्थव्यवस्थाओं के अनुकूलन पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। जबकि आईटी सर्विसेज, केमिकल्स और लेबर-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्र टैरिफ में कमी के कारण विकास के लिए तैयार हैं, समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत IP, डेटा और सस्टेनेबिलिटी मानकों से संबंधित जटिल रेगुलेटरी आवश्यकताओं को कितनी अच्छी तरह नेविगेट करता है। भू-राजनीतिक चालक एक दीर्घकालिक रणनीतिक संरेखण का सुझाव देते हैं, लेकिन व्यावहारिक आर्थिक परिणाम भारतीय व्यवसायों द्वारा सक्रिय अनुकूलन पर निर्भर करेंगे।
