रिकॉर्ड व्यापार के पीछे छुपा असंतुलन
चीनी राजदूत शू फेइहोंग के अनुसार, 2025 में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 12% की जोरदार बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो $155.6 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर जा पहुंचा। यह बड़ी छलांग 2020 में गलवान घाटी में हुए टकराव के बाद कूटनीतिक संबंधों में आई नरमी का नतीजा मानी जा रही है। खास बात यह है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अगस्त 2025 में तियानजिन में हुई 'सफल' मुलाकात के बाद यह आर्थिक जुड़ाव बढ़ा है। चीन ने भारत की आगामी BRICS अध्यक्षता और ग्लोबल साउथ एजेंडा को समर्थन देने का भी भरोसा दिलाया है, जिससे आपसी लाभ की दिशा में एक रणनीतिक तालमेल का संकेत मिलता है।
116 अरब डॉलर के पार पहुंचा व्यापार घाटा
व्यापार में इस उछाल के बावजूद, भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा है। अनुमानों और रिपोर्टों के अनुसार, 2025 में यह घाटा बढ़कर करीब $116 अरब डॉलर तक पहुंच गया। कुछ अनुमानों में यह फाइनेंशियल ईयर 2024-25 के लिए $99.2 अरब डॉलर तक भी बताया गया है। यह भारी असंतुलन इस बात का संकेत है कि भारत चीनी आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, जिससे आर्थिक निर्भरता और सामरिक कमजोरियां बढ़ सकती हैं।
आयात-निर्यात का असमान खेल
आंकड़े बताते हैं कि 2025 में भारत ने चीन से लगभग $113-114 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि चीन को भारत का निर्यात महज $14.25 अरब डॉलर के आसपास रहा। भारत से चीन को होने वाले निर्यात में 9.7% की वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन इसमें ज्यादातर कच्चे माल और कमोडिटीज जैसे लौह अयस्क और ऑयल मील शामिल हैं। वहीं, चीन से आने वाले सामानों में हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और केमिकल का दबदबा है। यह असमान व्यापार संरचना भारत की औद्योगिक कमजोरी और महत्वपूर्ण सेक्टर्स के लिए चीनी सप्लाई चेन पर निर्भरता को उजागर करती है।
कूटनीतिक रिश्तों के बीच सामरिक प्रतिस्पर्धा
यह आर्थिक जुड़ाव ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देशों के बीच सामरिक प्रतिस्पर्धा भी बनी हुई है। विश्लेषकों का सवाल है कि क्या अनसुलझे सीमा विवादों और दोनों देशों के बीच शक्ति असंतुलन के चलते यह व्यापारिक उछाल लंबे समय तक टिका रह पाएगा। चीन का 2025 में कुल व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) रिकॉर्ड $1.189 ट्रिलियन डॉलर रहा। वहीं, भारत के लिए अमेरिका उसका सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बन गया है, जिसके साथ भारत का व्यापार अधिशेष भारत के पक्ष में है। ऐसे में, 'वसुधैव कुटुंबकम' जैसे साझा दर्शन की कूटनीतिक बातों के बीच, चीन के साथ आर्थिक संबंध एक जटिल संतुलन का खेल है, जिसमें आर्थिक ज़रूरतें और सामरिक सतर्कता, दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।