सर्विस ट्रेड पर खास ध्यान
दोनों देशों के बीच प्रस्तावित कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (Comprehensive Economic Partnership Agreement) का मुख्य उद्देश्य भारत के विशाल टेक वर्कफोर्स को कनाडा की स्किल की जरूरतों को पूरा करने के लिए भेजना है। इसका लक्ष्य कमोडिटी ट्रेड से हटकर हाई-वैल्यू सर्विसेज की ओर बढ़ना है, ताकि फिजिकल सप्लाई चेन की दिक्कतों को दूर किया जा सके। लेकिन इसके लिए कनाडा को अपने एडमिनिस्ट्रेटिव नियमों में ढील देनी होगी, खासकर उन नियमों में जो विदेशी कंपनियों को सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स तक पहुंचने से पहले सालों तक स्थानीय तौर पर काम करने के लिए मजबूर करते हैं। यह नियम एक तरह का प्रोटेक्शनिस्ट (protectionist) उपाय है, जो भारतीय सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए मुश्किल खड़ी करता है, क्योंकि वे लंबी और बिना कमाई वाली शुरुआती अवधि का खर्च आसानी से नहीं उठा सकते।
आर्थिक असलियतें
मौजूदा $17 बिलियन के व्यापार को $50 बिलियन तक दोगुना करने के लिए सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति से ज्यादा की जरूरत है। कूटनीतिक बदलावों और असंगत औद्योगिक नीतियों के कारण दोनों देशों के बीच पिछले व्यापारिक समझौते अस्थिर रहे हैं। सरकारी उम्मीदों के बावजूद, एनालिस्ट्स (analysts) इस समय-सीमा को लेकर शंकित हैं। व्यापार को बढ़ावा देने के लिए प्रोफेशनल सर्विसेज के मूवमेंट को स्थिर करना होगा, जो बदलते इमिग्रेशन (immigration) नियमों और लाइसेंसिंग से प्रभावित होता है। ये व्यावहारिक कारक, जो अक्सर हाई-लेवल बातचीत में छूट जाते हैं, वास्तविक व्यावसायिक संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं। समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उन नॉन-टैरिफ बैरियर्स (non-tariff barriers) को कैसे हल किया जाता है, जो वर्तमान में कनाडाई व्यवसायों के पक्ष में हैं।
स्ट्रक्चरल इश्यूज और पॉलिसी कन्फ्लिक्ट्स
इस समझौते को सावधानी से देखने की जरूरत है। एक मुख्य मुद्दा भारत की खुली लेबर मोबिलिटी (labor mobility) की मांग और कनाडा की विदेशी लेबर को लेकर घरेलू चिंताओं के बीच टकराव का है। सर्विस एक्सपोर्ट्स पर निर्भरता पूरी ट्रेड एजेंडा को कनाडाई नियमों में बदलावों के प्रति संवेदनशील बनाती है। मैन्युफैक्चरिंग ट्रेड के विपरीत, जो स्पष्ट आउटपुट ग्रोथ दिखाता है, सर्विस एग्रीमेंट्स के लिए प्रोफेशनल स्टैंडर्ड्स के जटिल, मल्टी-ईयर कोऑर्डिनेशन (multi-year coordination) की आवश्यकता होती है। यदि इन रेगुलेटरी इश्यूज (regulatory issues) का समाधान नहीं होता है, तो राजनीतिक चर्चाओं के बावजूद यह समझौता $50 बिलियन के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएगा।
भविष्य का दृष्टिकोण
इन वार्ताओं की प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉर्पोरेट स्टेकहोल्डर्स (corporate stakeholders) कनाडा में ऑपरेशनल कॉस्ट्स (operational costs) के बारे में कितनी अच्छी तरह जानकारी साझा कर पाते हैं। अगर ट्रेड ऑफिशियल्स (trade officials) कॉन्ट्रैक्ट एलिजिबिलिटी (contract eligibility) के लिए पांच साल की लोकल ऑपरेशन की आवश्यकता को हटाने में कामयाब होते हैं, तो सर्विस सेक्टर, खासकर मिड-साइज़्ड आईटी (IT) और कंसल्टिंग (consulting) फर्मों को तत्काल लाभ मिल सकता है। इन विशिष्ट, लागू करने योग्य रियायतों के बिना, यह ट्रेड पैक्ट (trade pact) सिर्फ प्रतीकात्मक हो सकता है, और उन गहरे स्ट्रक्चरल इश्यूज (structural issues) को संबोधित करने में विफल हो सकता है जो द्विपक्षीय निवेश में वृद्धि को रोकते हैं।
