कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा, सितंबर 2023 में कूटनीतिक विवादों के कारण आई खटास के बाद द्विपक्षीय रिश्तों को फिर से मजबूत करने की एक बड़ी कोशिश है। इस बार के एजेंडे में आर्थिक मुद्दों पर खास जोर है, जिसमें फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) और यूरेनियम सप्लाई डील पर बातचीत को फिर से शुरू करना प्रमुख है। यह पहल न्यूक्लियर एनर्जी और क्रिटिकल मिनरल्स की बढ़ती वैश्विक मांग के बीच और भी अहम हो जाती है।
एनर्जी सिक्योरिटी और खनिजों पर फोकस
2026 की शुरुआत में ही यूरेनियम की कीमतें $100 प्रति पाउंड के पार चली गई हैं, क्योंकि दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा क्षमताएं बढ़ रही हैं और सप्लाई में कमी बनी हुई है। भारत ने 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर पावर का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए यूरेनियम की स्थिर सप्लाई बेहद जरूरी है। कनाडा, जो दुनिया के प्रमुख यूरेनियम उत्पादकों में से एक है, अपने एक्सपोर्ट मार्केट को सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रखना चाहता। ऐसे में, भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर है। भारत के हालिया 'शांति एक्ट 2025' (SHANTI Act 2025) के तहत सिविल न्यूक्लियर पावर में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को बढ़ावा मिलने से यूरेनियम की मांग और बढ़ने की उम्मीद है।
ट्रेड और आर्थिक साझेदारी की नई राहें
भारत तेजी से नए ट्रेड पैक्ट्स पर काम कर रहा है। 2025 में ही भारत ने यूके, ओमान, न्यूजीलैंड और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के साथ समझौते किए हैं, साथ ही अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ बातचीत भी चल रही है। 2026 की शुरुआत में भारत-ईयू एफटीए पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत 99.5% ट्रेड वैल्यू को कवर किया जाएगा। भारत और कनाडा के बीच 2023 में द्विपक्षीय व्यापार करीब $18.38 बिलियन था, जिसे एक कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) के जरिए दोगुना करने की क्षमता है।
यह बातचीत क्रिटिकल मिनरल्स पर भी केंद्रित है, जो भारत के एनर्जी ट्रांजिशन (energy transition) और औद्योगिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए लगभग पूरी तरह से चीन पर निर्भर है। कनाडा, जिसने अपना C$2 बिलियन का क्रिटिकल मिनरल्स सॉवरेन फंड (Critical Minerals Sovereign Fund) स्थापित किया है, खुद को एक भरोसेमंद सप्लायर के रूप में पेश कर रहा है। कनाडा-भारत क्रिटिकल मिनरल्स एनुअल डायलॉग (Canada-India Critical Minerals Annual Dialogue) की योजना बनाई जा रही है, जिसका लक्ष्य नीति समन्वय (policy coordination) और वैल्यू-एडिशन को बढ़ावा देना है।
कूटनीतिक अविश्वास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की चुनौतियां
इन सब आर्थिक अवसरों के बावजूद, दोनों देशों के बीच कूटनीतिक अविश्वास (diplomatic mistrust) की गहरी खाई बनी हुई है। सितंबर 2023 में खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय सरकार की संलिप्तता के आरोपों के बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी तनावपूर्ण हो गए थे, जिसके कारण दोनों तरफ से राजनयिकों (diplomats) को निकाला गया था। भारत इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है और इन्हें निराधार बताता है।
क्रिटिकल मिनरल्स और यूरेनियम के लिए वैश्विक प्रतिस्पर्धा (global competition) भी काफी कड़ी है। जहां कनाडा, चीन के दबदबे को चुनौती देने के लिए एक विकल्प पेश कर रहा है, वहीं भारत ऑस्ट्रेलिया, चिली और अफ्रीकी देशों जैसे संसाधन-संपन्न देशों के साथ भी अपने संबंध मजबूत कर रहा है। भारत का अपना 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन' (National Critical Mineral Mission) भी घरेलू अन्वेषण (exploration) और विदेशी अधिग्रहण (overseas acquisitions) पर जोर दे रहा है। ऐसे में, एफटीए और यूरेनियम डील को अंतिम रूप देना सिर्फ कूटनीतिक सद्भावना पर ही नहीं, बल्कि मजबूत व्यावसायिक शर्तों पर भी निर्भर करेगा, जो भू-राजनीतिक उतार-चढ़ाव (geopolitical headwinds) और बाजार की अस्थिरता (market volatility) का सामना कर सकें।
आगे का रास्ता: सतर्क आशावाद
विश्लेषकों का 2026 में यूरेनियम सेक्टर के लिए एक सतर्क आशावादी (cautiously optimistic) दृष्टिकोण है। सप्लाई में कमी और न्यूक्लियर एनर्जी की बढ़ती मांग के चलते कीमतों में मजबूती जारी रहने की उम्मीद है। जीटीआरआई (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि दोनों देशों के पास अपने रिश्तों को आगे बढ़ाने के मजबूत आर्थिक कारण हैं: कनाडा को एक्सपोर्ट में विविधता चाहिए और भारत को ऊर्जा व क्रिटिकल मिनरल्स की स्थिर सप्लाई। यह दौरा संबंधों को फिर से शुरू करने का एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन भारत की परमाणु क्षमता वृद्धि और क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन को विविध बनाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को तभी हासिल किया जा सकेगा, जब कूटनीतिक जुड़ाव बना रहेगा और ठोस, लंबी अवधि के समझौते जमीन पर उतरेंगे।