4 साल में दोगुना हुआ व्यापार: ECTA का कमाल
2 अप्रैल 2022 को साइन हुए India-Australia ECTA के अमल में आने के 4 साल बाद, दोनों देशों के बीच व्यापारिक ताने-बाने में जबरदस्त मजबूती आई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया जाने वाले भारतीय एक्सपोर्ट्स का आंकड़ा $4 अरब (FY 2020-21) से उछलकर $8.5 अरब (FY 2024-25) के पार जा पहुंचा है, जो कि 100% से भी ज्यादा की बढ़ोतरी है। इस अवधि में कुल द्विपक्षीय व्यापार भी बढ़कर $24.1 अरब तक पहुंच गया है। इस शानदार ग्रोथ के पीछे मुख्य वजह ऑस्ट्रेलिया द्वारा भारत से आयात होने वाले 100% उत्पादों पर तुरंत ड्यूटी-फ्री एक्सेस देना है। यह उम्मीद जताई जा रही है कि 1 जनवरी 2026 तक भारत के सभी एक्सपोर्ट्स को जीरो-ड्यूटी मार्केट एक्सेस मिल जाएगा। टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स और एग्रीकल्चर जैसे सेक्टर्स ने इस समझौते से खासी बढ़त हासिल की है। हाल ही में, 24 सितंबर 2025 को ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स के लिए हुए 'म्यूचुअल रिकॉग्निशन एग्रीमेंट' (MRA) ने इस व्यापार को और सुगम बना दिया है, जिससे सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया आसान हुई है।
किन सेक्टर्स की हुई चांदी?
ECTA के तहत, पहले जहां भारतीय टेक्सटाइल और गारमेंट एक्सपोर्टर्स को ऑस्ट्रेलिया में 5% तक कस्टम ड्यूटी देनी पड़ती थी, वह अब खत्म हो गई है। इससे भारतीय कॉटन गारमेंट्स और होम टेक्सटाइल्स जैसे प्रोडक्ट्स की कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ी है। यह अनुमान लगाया गया था कि ECTA के 3 साल के भीतर टेक्सटाइल और अपैरल एक्सपोर्ट्स लगभग तिगुने हो जाएंगे। इसी तरह, फार्मा सेक्टर को भी ऑस्ट्रेलिया की थेराप्यूटिक गुड्स एडमिनिस्ट्रेशन (TGA) द्वारा अन्य देशों के रेगुलेटर्स की रिपोर्ट्स को मान्यता देने से फायदा हो रहा है, जिससे भारतीय दवाओं के अप्रूवल में तेजी आ सकती है। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया के एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट्स भारत में 88% बढ़े हैं, जबकि भारतीय एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट्स में 35% का इजाफा हुआ है। ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए क्रिटिकल मिनरल्स का एक अहम सप्लायर भी बनकर उभर रहा है।
चुनौतियाँ और अड़चनें अभी भी बाकी
भले ही व्यापार के आंकड़े आकर्षक दिख रहे हों, लेकिन गहराई से देखने पर कुछ स्ट्रक्चरल असंतुलन और कमजोरियां भी नजर आती हैं। जहां ऑस्ट्रेलिया ने लगभग तुरंत ड्यूटी-फ्री एक्सेस दे दी, वहीं भारत ने शुरुआत में अपने केवल 70.3% टैरिफ लाइन्स पर ही प्रेफरेंशियल एक्सेस दिया था। इसके अलावा, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच ट्रेड डेफिसिट (आयात का निर्यात से ज्यादा होना) लगातार बना हुआ है, जो ऑस्ट्रेलिया के बड़े कोल एक्सपोर्ट्स जैसे फैक्टर्स से और बढ़ जाता है। अक्सर भारत की रेगुलेटरी कॉम्प्लेक्सिटी, पारदर्शिता की कमी और ब्यूरोक्रेटिक हर्डल्स (नौकरशाही की बाधाएं) पूरी तरह लाभ उठाने में रुकावट पैदा करती हैं। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ECTA एक 'पार्शियल एग्रीमेंट' है, क्योंकि इसमें सर्विसेज, इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन या लेबर मोबिलिटी जैसे अहम क्षेत्र पूरी तरह शामिल नहीं हैं।
आगे का रास्ता: गहरी आर्थिक साझेदारी की ओर
ECTA को एक मजबूत नींव माना जा रहा है, जो गुड्स ट्रेड से आगे बढ़कर एक 'कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक कोऑपरेशन एग्रीमेंट' (CECA) की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस व्यापक समझौते का मकसद क्रिटिकल मिनरल्स, हेल्थकेयर, टेक्नोलॉजी और साइंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करना है। भारत की 2030 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया का रणनीतिक जुड़ाव, इस साझेदारी को और मजबूत करने के प्रमुख कारक हैं। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह द्विपक्षीय व्यापार $45-50 अरब के आंकड़े को छू सकता है, बशर्ते कि स्ट्रक्चरल चुनौतियों और नॉन-टैरिफ बैरियर्स (गैर-टैरिफ बाधाओं) को प्रभावी ढंग से निपटाया जाए।